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बहनों चलो बंगाल चलें लेके नीला ड्रम

साहित्य भूषण कमलेश मौर्य मृदु के संचालन में कवि गोष्ठी संपन्न

सीतापुर। बिसवां जानकी पुरम लखनऊ में आयोजित कवि गोष्ठी का सफल संचालन करते हुए साहित्य भूषण कमलेश मौर्य मृदु ने सभी का मन मोह लिया। 

राष्ट्रीय कवि संगम के राष्ट्रीय मंत्री एवं उत्तर प्रदेश के प्रभारी श्री मृदु ने अपने आशु कवित्व से सभी को चमत्कृत कर दिया। 

आध्यात्मिक चित्त-वृत्ति के अध्येष्टा सुनील कुमार श्रीवास्तव के संयोजन, प्रखर वक्ता विष्णु कान्त मिश्र जी की गरिमामयी अध्यक्षता में एक सरस काव्य-गोष्टी सम्पन्न हुई। इससे पूर्व समस्त कवियों का पुष्पहार, अंगवस्त्रम एवं माँ गायत्री का प्रतीक चिह्न देकर संयोजक ने सम्मानित किया।

साहित्यिक अनुष्ठान का आरम्भ एक मात्र कवयित्री सुधा सिंह "सुधा''द्वारा माँ शारदे की वाणी वन्दन से हुआ।n तत पश्चात कार्य-क्रम को गति देते हुए वरिष्ठ कवि वेद प्रकाश सिंह "प्रकाश'' ने माँ के कृत्तित्व एवं व्यक्तित्व को प्रत्यक्ष करते हुए अपने छंदों से उपस्थित साहित्यानुरागियों को भाव विभोर कर दिया। 

विशेष कर माँ की भूमिका में पढ़ा गया मुक्तक विशेष सराहा गया---प्रतिमा में ही नही समायीं, प्रति माँ में जगदम्ब हैं। दोनों ही सृष्टा सर्जक अउ, दोनों ही अवलम्ब हैं। 

वहीँ अपने हास्य-व्यंग्य से श्रोताओं को आनंदित करने वाले संदीप "अनुरागी''की पैसों के महत्व को रेखांकित करती निम्न पंक्तियाँ बहुत ही सराही गयीं जीवन में संग्राम जमाना पैसन का।

दाम करें सब काम, जमाना पैसन का। कविता के केन्द्रीय भावों को परिभाषित करते हुए वरिष्ठ कवि अमर बहादुर सिंह"अमर'' ने कहा अन्तर्मन की कथा-व्यथा की कविता एक पहेली है।

प्रकृति प्रेम सौन्दर्य जड़ित, भावों की सौम्य सहेली है।।

अपनी मधुर स्वर लहरी में विरहणी नायिका के वियोगित मनोभावों  का सजीव चित्रण करते हुए सुधा सिंह "सुधा ने पढ़ा सइंया गये परदेसवा, सखी मोरा जियरा डेरावै। 

वही देश के मंचों की शान  साहित्य भूषण कमलेश मौर्य "मृदु'' ने समसामयिक घटनाक्रम बंगाल पर जब मुक्तक पढ़ा, जिसमे नारियों के आक्रोशित स्वर का आलम्बन था; सभी ने मुक्त कंठ से सराहा जेहादी ऩगा नाच कर रहे हैं बेशरम!

  • उनकी ये सारी दादागीरी करनी है ख़तम।
  • पुरुषों ने तो, लगता पहन लीं हैं चूड़ियां
  • बहनों चलो बंगाल चलें, लेके नीला ड्रम!!

अध्यक्षता कर रहे वरेण्य कवि विष्णुकान्त मिश्र ने सांसारिक मोहवृत्ति मूलक मनोवृत्तियों को प्रत्यक्ष करते हुए प्रबोधात्मक रचना पढ़ी--सोंचता हूँ चलूँ जब यहाँ से कभी,

सारा सामान भी साथ ले के चलूँ।

सुनील श्रीवास्तव ने आध्यात्मिक पुष्टता के सकारात्मक प्रभाव को रेखांकित करते हुए कहा स्वयं को जानो, पहिचानो ,स्वात्म दर्शन भाव विभोर कर देता है। इससे पूर्व अवधी कला समन्वय समिति अमेठी द्वारा सद्य प्रकाशित"चितेरयिअवधी कयि'' साझा संकलन के प्रधान संपादक ज्ञानेन्द्र पाण्डेय "अवधी मधुरस'' प्रेषित प्रतियां सभी साहित्यकारों को सप्रेम भेंट की गई; जिसकी सभी ने सराहना की। कार्यक्रम के समापन पूर्व अशक्त, असहायों के लिए अनाथालय द्वारा सेवा करने वाले डॉ0 अमित सक्सेना ने बुजुर्गों  की सेवा पर बल देने का आह्वान किया।

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