रविंद्र प्रताप सिंह (रवि): वो शख्स जिसने मृत्यु के सन्नाटे में मानवता की आवाज़ बनकर 3800 शवों को दिया सम्मान
शमशान बना आशियाना, मोह माया से मुक्त मृत शरीरों में दिखा भगवान - रवि सिंह
संवाददाता, लखनऊ l जब दुनिया ने अपने दरवाज़े बंद कर लिए थे, अपनों ने भी अपनों से मुँह फेर लिया था, अस्पतालों में साँसे रुक रही थीं और शमशान घाटों में चिताएं लगातार जल रही थीं — उस भयावह मंजर में एक चेहरा ऐसा भी था, जो लोगों को जीवन में नहीं परंतु मृत्यु के बाद सम्मान दे रहा था। नाम है रविंद्र प्रताप सिंह उर्फ रवि, जो न सिर्फ एक कर्मठ कर्मचारी हैं, बल्कि मानवता के सबसे कठिन इम्तहान में खरे उतरने वाले सच्चे योद्धा हैं। शमशान घाट बना तपोस्थली साल 2021, अप्रैल का महीना... लखनऊ का बैकुंठ धाम शवदाह गृह देश के सबसे व्यस्त शमशान घाटों में बदल चुका था। चिताओं की आग बुझने का नाम नहीं ले रही थी। उस दौरान जब अधिकांश कर्मचारी भय से दूर हो गए, रवि ने पीछे नहीं देखा। उन्होंने 8 अप्रैल से 8 जून 2021 तक दो माह तक शमशान में ही रहकर — 3800 से अधिक शवों का अंतिम संस्कार किया। यह सिर्फ आँकड़ा नहीं, हर एक शरीर के पीछे एक टूटता हुआ परिवार, एक आखिरी विदाई की पीड़ा, और रवि जैसे एक संवेदनशील हाथों की गरिमा थी।
उनका कहना है — “मैंने मृत शरीरों में भगवान को देखा। जब परिजन तक शवों को छूने से डरते थे, तब मैं खुद उन्हें अग्नि देने के लिए उठाता था। वह सेवा थी, सिर्फ ड्यूटी नहीं।”
परिवार से दूर, मानवता के और करीब
जब रवि शमशान घाट में जीवन का सबसे कठिन दौर झेल रहे थे, तब उनके अपने घर पर पत्नी, माता-पिता, एक बहन, एक भाई और दो बच्चे उनका इंतजार कर रहे थे। लेकिन वे जानते थे — उस समय परिवार से बढ़कर हजारों परिवारों की जरूरत थी। इन दो महीनों में उन्होंने न घर का भोजन किया, न अपने बच्चों को देखा। वहीँ खाना, वहीँ सोना, वहीँ रहना — और अग्नि की लपटों के बीच शांत चेहरा लिए सेवा करते रहे।
संत सेवा से जोड़कर मानव सेवा
कोरोना समाप्त होने के बाद भी रवि का सेवा कार्य रुका नहीं। आज वे संत सोमवारी महाराज सेवा संस्थान के मार्गदर्शन में बैकुंठ धाम पर आने वाले शोकाकुल परिवारों के लिए कुर्सियों, पानी, छांव व विश्राम की व्यवस्था अपनी कमाई से कर रहे हैं।
संस्थान के संस्थापक श्री एस.एन. सिंह का मानना है “रवि सिर्फ एक सरकारी कर्मचारी नहीं, एक संवेदनशील हृदय वाला समाजसेवी हैं। उन्होंने मृत्यु के बाद जो किया, वह जीवन में भी कोई नहीं करता।”
सरकार से सवाल: क्या ऐसे योद्धा को सम्मान नहीं मिलना चाहिए?
जहां छोटी-छोटी घोषणाएं करने वाले लोग पुरस्कार पाते हैं, वहीं रवि जैसे वास्तविक योद्धा आज भी गुमनाम हैं। न कोई पदक, न सरकारी प्रशंसा, न कोई आर्थिक सहयोग।
क्या यह सवाल नहीं उठना चाहिए कि ऐसे इंसान को ‘पद्मश्री’ या ‘राष्ट्रीय कोरोना योद्धा सम्मान’ क्यों नहीं दिया गया?
यह केवल रवि के लिए नहीं, बल्कि हर उस गुमनाम कर्मवीर के लिए सवाल है जो केंद्र व राज्य सरकारों की नजरों से अब तक अनदेखा रह गया।
रवि सिंह का आमजन के लिए संदेश है कि आओ, साथ जुड़ो सेवा के इस यज्ञ में, रवि का जीवन यह बताता है कि सेवा के लिए मंच नहीं, मन चाहिए और इनका मन एक विशाल सागर की तरह है l
आज भी वे लोगों से अपील करते हैं: “बैकुंठ धाम आओ, सेवा करो, एक पौधा लगाओ, एक बाल्टी पानी भरो, किसी परिवार को छांव दो। यह पुण्य का कार्य है।” रविंद्र प्रताप सिंह (रवि) ने मौत के बीच में उम्मीद की लौ जलाई। उन्होंने दिखाया कि मानवता मरती नहीं — बस कुछ हाथों की जरूरत होती है उसे उठाने के लिए।
आज अगर कोई सच में ‘धरती का देवदूत’ कहलाने योग्य है, तो वह हैं — रवि सिंह ।

Great work. Commendable.
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