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सपा के लिये "खतरे की घंटी"?

सपा के लिये "खतरे की घंटी" बनता जा रहा है अखिलेश का बड़बोलापन

अजय कुमार

लखनऊ। दिल्ली विधान सभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की और अयोध्या के मिल्कीपुर विधान सभा उपचुनाव में समाजवादी पार्टी की हार के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत का भी मिजाज बदलता जा रहा है। इस बदलते मिजाज से भारतीय जनता पार्टी की बल्ले-बल्ले नजर आ रही है, वहीं समाजवादी पार्टी के सामने फिर से यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया है कि वह पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक (पीडीए) पर और कितना भरोसा करे।सपा प्रमुख को मिल्कीपुर की हार से तो झटका लगा ही है, लेकिन अखिलेश के लिये उससे भी ज्यादा सदमें वाली बात यह है कि मिल्कीपुर में पीडीए ही नहीं यादव बिरादरी वालों ने भी समाजवादी पार्टी से मुंह मोड़ लिया।यहां करीब 65 हजार यादव वोटर हैं। 

यादव वोटर से सपा से मुंह मोड़ने की वजह अखिलेश से अधिक अवधेश प्रसाद को बताया जाता हैं। मिल्कीपुर विधान सभा सीट कभी मित्रसेन यादव के वर्चस्व वाली सीट हुआ करती थी,लेकिन 2012 में इसे एससी सीट घोषित कर दिया गया था। तब से यहां का सियासी समीकरण बदल गया। 

यादव की जगह दलित नेता उभरने लगे। अवधेश प्रसाद भी इसी कड़ी का हिस्सा हैं। वह पासी समाज से आते हैं। इतना ही नहीं अवधेश प्रसाद ने मिल्कीपुर के यादव वोटरों को कभी तवज्जो नहीं दी। सपा के बड़े नेता मित्रसेन यादव और उनके पुत्र से भी अवधेश के रिश्ते बिगड़े हुए रहे। 

मिल्कीपुर की जीत बीजेपी के लिये आसान नहीं लग रही थी,लेकिन बीजेपी ने अपने राजनैतिक कौशल के जरिये आसान बना दिया। 

एक तो बीजेपी ने अवधेश के सामने उन्हीं की बिरादरी का नेता चन्द्रभानु पासवान को मैदान में उतार दिया। दूसरे बीजेपी  जनता को यह मैसेज देने में भी सफल रही कि समाजवादी पार्टी पारिवारिक पार्टी है। 

इसलिये उसे सांसद अवधेश प्रसाद के बेटे के अलावा कोई प्रत्याशी ही नहीं मिला,जबकि यहां समाजवादी पार्टी के कई कद्दावर नेता मौजूद थे।

टिकट चाहने वालों की लिस्ट में कुछ यादव नेता भी शामिल थे,जिनको भी अखिलेश के फैसले से झटका लगा। इसके चलते यादव वोटर समाजवादी पार्टी को सबक सिखाने को आतुर हो गये। इसी लिये बीजेपी को शानदार जीत से कोई रोक नहीं पाया। 

नतीजे आने के बाद जनता के बीच मैसेज गया कि सपा का पीडीए वोट बैंक तार-तार हो गया है।

हालात यह हो गई की अखिलेश यादव को स्वयं आगे आकर अपने कार्यकर्ताओं को कहना पड़ गया कि पार्टी पीडीए फार्मूले से पीछे नहीं हटेगी। 

2027 के यूपी विधान सभा चुनाव भी पीडीए के सहारे ही जीता जायेगा,लेकिन मिल्कीपुर से शर्मनाक हार के बाद समाजवादी पार्टी को अपना वोट बैंक बढ़ाने की भी चिंता सताने लगी है। 

सपा 2027 के विधान सभा चुनाव से पहले कुछ छोटे दलों के उन नेताओं को भी साथ जोड़ सकती है,जिनका अपनी बिरादरी पर अच्छी खासी पकड़ है। इसके साथ ही सपा प्रमुख ने यह भी तय कर लिया है कि वह मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करने के लिये मुस्लिमों से जुड़े मुद्दों को संसद से लेकर सड़क तक उछालते रहेगें और जहां जरूरी होगा,वहां चुप्पी साधकर काम चला लेंगे।

इस बात का अहसास अयोध्या में दो दलित बच्चियों के साथ हुए अपराध में समाजवादी पार्टी का अलग-अलग नजरिया देखने से साफ भी हो गया। 

पहली घटना में आरोपी मुस्लिम समाज से जुड़ा सपा नेता था तो पूरी पार्टी और अयोध्या के सपा सांसद अवधेश प्रसाद आरोपी को बचाते दिखे वहीं,वहीं दूसरी घटना में जब सपा को ऐसा कुछ नजर नहीं आया तो वह पीड़ित बच्ची के लिये सार्वजनिक मंच से घड़ियाली आंसू गिराने लगे,लेकिन सपा और उनके नेताओं का कोई भी पैंतरा काम नहीं आया। 

दलितो, पिछड़ों और यादवों ने पूरी तरह से समाजवादी पार्टी प्रत्याशी को ठेंगा दिखा दिया। सिर्फ मुसलमान ही उसके साथ खड़ा नजर आया। यानी मिल्कीपुर में अखिलेश के पीडीए पर बीजेपी का हिन्दुत्व को लेकर योगी का आक्रमक रवैया काफी भारी पड़ा।

मिल्कीपुर का दर्द समाजवादी पार्टी प्रमुख भूल नहीं पा रहे थे तो दूसरी तरफ महाकुंभ में प्रतिदिन जुट रहे करोड़ों श्रद्धालुओं की भीड़ अखिलेश की बेचैनी बढ़ा रही थी। महाकुंभ में जातिवाद की दीवारें तोड़कर एकजुट श्रद्धालु सनातन का गौरव बढ़ा रहे थे तो वहीं अखिलेश यादव महाकुंभ को बदनाम करने और लोगों को डराने में लगे थे। अखिलेश को लगता है कि योगी का हिन्दुत्व सपा के पीडीए पर भारी पड़ रहा है।

इसी लिये अखिलेश महाकुंभ की व्यवस्था को अव्यस्था का जामा पहनाने में लगे हैं, ताकि लोग महाकुंभ आने से डरे। उसी समय मौनी अमावस्या पर भगदड़ में कुछ लोगों की मौत पर अखिलेश का सियासी प्रलाप और तेज हो गया। वह झूठ और प्रपंच के सहारे अपनी सियासत चमकाने के लिये बार-बार योगी सरकार पर आरोप लगा रहे थे कि सरकार मौत का आकड़ा छिपा रही है। 

ऐसे में लोग अखिलेश से सवाल करने लगे कि वह पहले 1990 में अयोध्या में कारसेवकों की मौत का आकड़ा बतायें,जब उनके पिता तत्कालीन मुलायम सिंह ने निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलाकर सरयू को खून से लाल कर दिया था,लेकिन अखिलेश किसी सवाल का जबाव देने की राजनीति करते ही नहीं है। 

वह तो इस समय सिर्फ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पीछे पड़े हैं।इसी के चलते समाजवादी पार्टी को भविष्य में और भी बड़ा सियासी नुकसान उठाना पड़ जाये तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

क्योंकि 20 फीसदी मुसलमान वोट पक्का करने के लिये अखिलेश लगातार 80 फीसदी हिन्दुओं को बदनाम और बांटने में लगे हैं,लेकिन इसमें वह फिलहाल तक संभल नहीं पाये हैं। 

भले ही 2024 के लोकसभा चुनाव में उनका परफारमेंस अच्छा रहा था, लेकिन उनको यह भी पता है कि 2024 के आम चुनाव में सपा को जो जीत मिली उसके पीछे उनका पराक्रम कम, भाजपा नेताओं की भीतरी कलह-कलेश ज्यादा जिम्मेदार थी। कुल मिलाकर अखिलेश की छवि बड़बोले नेता की बनती जा रही है। 

अखिलेश के साथ सबसे बड़ी समस्या यह नजर आ रही है कि वह जहां चुप रहकर अपनी पार्टी को भला कर सकते हैं,वहां भी जुबान से जहर उगलते रहते हैं।

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