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सच में ऐसी स्त्री दर्शन के योग्य है..!

मैंने सुना है कि एक रात एक पति घर वापस लौटा, वह थका-मांदा है, वह बिस्तर पर लेट गया है। उसने अपनी पत्नी से कहा कि जल्दी पानी ले आ, मुझे बहुत जोर से नींद आती है।

पत्नी पानी लेने गई है। वह जब लेकर लौटी तब तक पति सो ही गया है। तो उस पत्नी ने यह सोचा कि नींद तो लग गई है, अब नींद तोडूं वह भी ठीक नहीं है, और प्यास तो लगी थी, तो अगर मैं पानी रख कर सो जाऊं, तो नींद खुले, प्यास तब तक और भी बढ़ गई होगी, तो वह पानी का बरतन लिए चुपचाप रात भर उसके बिस्तर के करीब खड़ी रही। पता नहीं कब नींद टूट जाए और पता नहीं कब पानी का खयाल आ जाए और मैं सो जाऊं। 
कोई सुबह भोर होते-होते पति की नींद खुली, तो वह बहुत हैरान हुआ। उसने कहा कि तू यह बर्तन लिए यहां क्यों खड़ी है? 

उसने कहा कि मैंने सोचा कि नींद तोडूं वह भी ठीक नहीं, और आप प्यासे हैं और मैं सो जाऊं और हो सकता है कि मुझे नींद न तोड़े मेरी, इस कारण आप प्यासे ही पड़े रहें, इसलिए मैं रात यहीं खड़ी रही। 

यह आस-पास खबर पहुंच गई। गांव के सम्राट तक खबर पहुंच गई। गांव का सम्राट उस स्त्री के दर्शन करने आया। सच में ऐसी स्त्री दर्शन के योग्य है। वैसे ऐसी स्त्री मिलना थोड़ा मुश्किल है।

सम्राट जब उसके दर्शन करने आया और बहुत से हीरे-जवाहरात भेंट करने आया। उसने कहा कि ऐसी स्त्री भी इस राज्य में है। मैं धन्यभागी हुआ। पड़ोस की स्त्रियों को आग लग गई। स्त्रियों को काम ही नहीं है सिवाय इसके कि एक-दूसरी स्त्री के प्रति उनको आग लगती रहे। सब तरफ बात फैल गई। स्त्रियों ने कहाः इसमें बात ही क्या खास है? कल हम ही करके दिखा देंगे। इसमें ऐसी बात ही कौन सी खास है?

पड़ोस में एक स्त्री जिसने कहा कि यह तो हद हो गई, इतनी सी बात के लिए इतने हीरे-जवाहरात? इतना शोरगुल? इतनी फूलमालाएं? गांव भर में यह चर्चा और यह देवी बना देना, इसमें रखा क्या है, यह तो हम भी कर सकते हैं। उसने अपने पति से कहा कि ध्यान रखो, आज जब लौट कर आओ तो थके-मांदे लौटना। आते से ही बिस्तर पर लेट जाना और कहना कि प्यास लगी है। 
मैं पानी लेकर आऊं, तब ध्यान रहे, सो जाना, जागे मत रहना और मैं रात भर खड़ी रहूंगी। इसमें बात ही क्या है? सुबह आंख खुले तो पूछना कि अरे, तू रात भर खड़ी रही? तब मैं वही उत्तर दूंगी जो कि दिया गया है। और तब गांव भर में खबर फैला देना। सम्राट कल हमारे द्वार पर भी आएं।

हुआ, रिचुअल पूरा हो गया। क्रियाकांड पूरा कर दिया गया। पति थक कर लौटा। पति कुछ भी कर नहीं सकता। पत्नी ने आज्ञा दी थी, थक कर लौटना पड़ा। आकर लेट गया, उसने कहा, बड़ी प्यास लगी है। और पूरे जो भी व्यवस्थित किया गया था नाटक, वह खेला गया। जब पति सो गया तो पत्नी ने सोचा कि अब कोई देख भी तो नहीं रहा, रात भर खड़े रहने का मतलब क्या है, सुबह-सुबह फिर खड़े हो जाएंगे। स्वाभाविक था, जिस तर्क से वह चल रही थी उसमें यह तर्क बिलकुल ही संगत था। अभी तो कोई देख भी नहीं रहा। खबर तो सुबह उड़ानी है। और पति को कह दिया, सुबह तक आंख खोलना मत और बीच में सुबह आंख खोल कर पूछना कि अरे तू अब तक खड़ी है।

पत्नी सो गई। अब पति बार-बार सुबह आंख खोल कर देख रहा कि वह भी सो रही तो वह बेचारा फिर आंख बंद कर लेता, क्योंकि जब वह बर्तन लेकर खड़ी हो जाए तब वह पूछे कि अरे तू खड़ी है। क्योंकि इसके आगे पूरी कथा चले। वे डायलाॅग तो सब तय थे। वह कथा भी चल गई। उन्होंने आस-पास खबर भी पहुंचा दी। लेकिन न सम्राट आया, न गांव से कोई खबर आई। उस स्त्री ने कहा कि बड़ी ज्यादती मालूम हो रही है। बड़ा अन्याय मालूम हो रहा है। जो किया गया वही यहां भी किया गया है। वह सम्राट के पास गई। उसने कहा कि अन्याय हो रहा है। एक के साथ यह और हमारे साथ यह व्यवहार।
तो सम्राट ने कहाः पागल, कुछ चीजें हैं जो होती हैं, की नहीं जाती हैं। हो जाए तो उनमें फूलों की सुगंध होती है, की जाएं तो कागज के फूल रह जाते हैं।

धर्म कुछ ऐसी चीज नहीं है कि की जा सके। होने वाली बात है। घटना है जो घटती है। हम सिर्फ प्रतीक्षा कर सकते हैं। हम तैयारी कर सकते हैं। 

हम रो सकते हैं, हम प्रार्थना कर सकते हैं कि वह घट जाए। लेकिन हमने एक क्रियाकांड बनाया है, जिसमें हम धर्म कर रहे हैं। हमने धर्म को एक क्रिया बनाई है, जब कि धर्म एक क्रिया नहीं है। धर्म एक अनुभव है जो घट सकता है, जैसे प्रेम एक अनुभव है।

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