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भारत में हर साल लगभग 3 लाख लोग ऐसी मौतों का शिकार हो रहे हैं, जो पूरी तरह से रोकी जा सकती!

भारत में आतंकवाद या प्राकृतिक आपदाओं से कहीं बड़ा संकट अत्यधिक चिंताजनक

मनोज मानव 

भारत में हर साल लगभग 3 लाख लोग ऐसी मौतों का शिकार हो रहे हैं, जो पूरी तरह से रोकी जा सकती हैं, जिसमें सड़क दुर्घटना, अपराध, आत्महत्या और कस्टोडियल मौत के मामले प्रमुख है। वर्ष 2024 में अकेले सड़क दुर्घटनाओं ने 1,80,000 जिंदगियां छीन लीं, जिनमें 30,000 मौतें सिर्फ हेलमेट न पहनने की वजह से हुईं, और लोकसभा के ताजा आंकड़े इसकी भयावहता को उजागर करते हैं: 2023 में 1,73,000 मौतें हुईं, जो 2022 की तुलना में 2.6% बढ़कर 2024 में 1,80,000 तक पहुंच गईं। 

इनमें 44% दोपहिया वाहन चालक थे, जिसमें 70% ने हेलमेट नहीं पहने थे और 20% पैदल यात्री थे, यानी करीब 35,000 मौतें।

इसके अलावा, 28,522 हत्याएं, 1,70,000 आत्महत्याएं और 4,484 कस्टोडियल मौतें भी दर्ज की गईं, जो सरकार की लापरवाही और नीतिगत नाकामी को साफ दर्शाती हैं।

सरकार यात्रियों से महंगे टेक्स वसूलने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती है, लेकिन टूटी सड़कें, ओवरलोडेड वाहन और बुनियादी ढांचे की अनदेखी से हर दिन लोगों को मौत के मुंह में धकेल रही है।

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का सड़क दुर्घटनाओं में 50% कमी का लक्ष्य हवा-हवाई साबित हुआ, जिसमें ओवरलोडिंग से हुई 12,000 मौतें इसकी मिसाल हैं। अपराधियों को सजा देने में सालों लगते हैं, जिससे अपराध बढ़ रहे हैं, और जातिय आधारों पर न्याय देनें का फैशन सिर चढ़कर बोल रहा है और तो और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सरकार धार्मिक पर्यटन पर करोड़ों खर्च कर रही है, लेकिन सड़कों की दुर्दशा और नागरिकों की सुरक्षा को नजरअंदाज कर रही है। 

यह सरकार द्वारा प्राथमिकताओं की गलत दिशा है, जो हर साल मालदीव या भूटान जैसे छोटे देश की आबादी के बराबर लोगों की जान ले रही है। एक ऐसा नुकसान जो 2008 के मुंबई हमले (166 मौतें) या हिरोशिमा विस्फोट (1,40,000 मौतें) से भी बड़ा है।

हर साल 3 लाख मौतें एक मानवीय संकट है, देश के नागरिकों की जिंदगी की रक्षा के लिए सरकार को जवाबदेह बनना होगा, और इस पर हर एक व्यक्ति द्वारा सवाल पूछी भी जानी चाहिए।

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