Skip to main content

प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में छात्रा की हत्या पर पूरे देश में सड़को पर उतरे लोग


वाराणसी। भेलूपुर स्थित रामेश्वरम गर्ल्स हॉस्टल में रहकर मेडिकल प्रवेश परीक्षा (NEET) की तैयारी कर रही बिहार के सासाराम जिले की 17 वर्षीय छात्रा स्नेहा सिंह की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, मध्यप्रदेश, राजस्थान, झारखंड जैसे प्रदेशो में व्यापक आक्रोश को जन्म दिया है।

9 फरवरी दिन रविवार को लोगो ने जन्तर मंतर दिल्ली पर जबर्दस्त प्रदर्शन किया। उन्होंने पुलिस प्रशासन पर स्नेहा के परिजनों को न्याय से वंचित करने और मामले को दबाने का आरोप लगाया। इस प्रदर्शन में स्नेहा के परिजनों के साथ बिहार, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के नागरिक भी शामिल थे।

स्नेहा की मौत 31 जनवरी को हुआ लेकिन भेलुपुर वाराणसी पुलिस ने FIR, 10 फरवरी को दर्ज किया, वही परिजनों का दावा है कि यह आत्महत्या नहीं बल्कि सुनियोजित हत्या है, जिसे आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की जा रही है। घटना के तुरंत बाद से ही इस मामले को लेकर लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। छात्र संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों ने इसमें सक्रिय भूमिका निभाई है। परिजनों का आरोप है कि पुलिस जांच में लापरवाही बरत रही है और दोषियों को बचाने की कोशिश की जा रही है।

कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट के कई वकीलों एड. चंद्रगुप्त मौर्य, एड. अमरजीत, शिवा मौर्यवँशी, देवेन्द्र भारती, अजीत कुशवाहा, एड. हेमंत कुमार के साथ सैकड़ो की संख्या में लोग यूपी भवन दिल्ली का घेराव किये थे। लेकिन शासन-प्रशासन को कोई फर्क नही पड़ा। जिसके कारण दुबारा दिल्ली के जंतर मंतर पर वर्तमान सरकार और उत्तर प्रदेश पुलिस के खिलाफ जन आक्रोश मार्च किया गया। लोगो का कहना है कि अगर पुलिस प्रशासन जल्द से जल्द आरोपियों को गिरफ्तार नही करेगी। तो वाराणसी में सरकार और पुलिस के खिलाफ लाखों की संख्या में पुरजोर विरोध प्रदर्शन किया जाएगा। 
लोगो का कहना है कि अगर स्नेहा ने सुसाइड किया था। तो पुलिस ने पोस्टमार्टम के बाद स्नेहा को परिवार के सुपुर्द क्यों नही किया। ? पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर परिवार वालों का सहमति क्यों नही लिया गया। ? FIR दस दिन बाद क्यों लिखा गया। ? 
स्नेहा के सुसाइड करने पर परिवार वालों को पुलिस प्रशासन ने सूचना दिए बगैर बॉडी फंदे से क्यों उतारा। ऐसे कई सवाल लोगो के द्वारा पुलिस प्रशासन पर कर रहे है। एवम लोगो के द्वारा आरोप लगाया जा रहा है वर्तमान भाजपा सरकार के इशारे पर आरोपियों को बचाया जा रहा है।

Comments

Popular posts from this blog

रविंद्र प्रताप सिंह (रवि): वो शख्स जिसने मृत्यु के सन्नाटे में मानवता की आवाज़ बनकर 3800 शवों को दिया सम्मान

शमशान बना आशियाना, मोह माया से मुक्त मृत शरीरों में दिखा भगवान - रवि सिंह संवाददाता, लखनऊ l जब दुनिया ने अपने दरवाज़े बंद कर लिए थे, अपनों ने भी अपनों से मुँह फेर लिया था, अस्पतालों में साँसे रुक रही थीं और शमशान घाटों में चिताएं लगातार जल रही थीं — उस भयावह मंजर में एक चेहरा ऐसा भी था, जो लोगों को जीवन में नहीं परंतु मृत्यु के बाद सम्मान दे रहा था। नाम है रविंद्र प्रताप सिंह उर्फ रवि, जो न सिर्फ एक कर्मठ कर्मचारी हैं, बल्कि मानवता के सबसे कठिन इम्तहान में खरे उतरने वाले सच्चे योद्धा हैं। शमशान घाट बना तपोस्थली साल 2021, अप्रैल का महीना... लखनऊ का बैकुंठ धाम शवदाह गृह देश के सबसे व्यस्त शमशान घाटों में बदल चुका था। चिताओं की आग बुझने का नाम नहीं ले रही थी। उस दौरान जब अधिकांश कर्मचारी भय से दूर हो गए, रवि ने पीछे नहीं देखा। उन्होंने 8 अप्रैल से 8 जून 2021 तक दो माह तक शमशान में ही रहकर — 3800 से अधिक शवों का अंतिम संस्कार किया। यह सिर्फ आँकड़ा नहीं, हर एक शरीर के पीछे एक टूटता हुआ परिवार, एक आखिरी विदाई की पीड़ा, और रवि जैसे एक संवेदनशील हाथों की गरिमा थी। उनका कहना है — “मैंने मृत शरी...

“अफसरों की लापरवाही और सरकार की अनदेखी: उजड़ने की कगार पर संजय कॉलोनी भाटी माइंस”

जितेंद्र कुशवाहा दिल्ली के दक्षिणी इलाके में स्थित संजय कॉलोनी भाटी माइंस के लोग आज भी अपने अधिकार और अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह वही कॉलोनी है, जिसे वर्ष 1976 में दिल्ली सरकार ने विधिवत बसाया था और यहां के निवासियों को पट्टे भी दिए गए थे। उस समय ग्रामीणों को यह भरोसा दिलाया गया था कि अब उन्हें एक स्थायी ठिकाना मिल गया है। लोग गांव से आए, मजदूरी की, और जीवनभर की कमाई लगाकर ईंट-पत्थर से अपने आशियाने खड़े किए। लेकिन 1991 में अफसरों की लापरवाही और सरकार की अनदेखी ने यहां के निवासियों की जिंदगी को अंधकार में धकेल दिया। अधिकारियों की एक गलत रिपोर्ट और अदूरदर्शी निर्णय के कारण पूरी कॉलोनी को रिज क्षेत्र (संरक्षित वन क्षेत्र) घोषित कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि 15 साल पहले जिन घरों को कानूनी मान्यता दी गई थी, वे अचानक “अवैध” हो गए। आज हालात यह हैं कि सरकार और प्रशासन उन्हीं घरों को तोड़ने पर आमादा है, जिन पर लोगों ने अपना खून-पसीना बहाकर जीवन की पूंजी लगा दी थी। इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते हुए नव युवक ग्राम विकास समिति के सदस्य एवं ‘संसार जनकल्याण एक किरण फाउंडेशन’ के संस्थापक समाज...

नगर निकायों में कर्मचारियों से उच्च पद का कार्य लेना बंद होगा

लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार ने नगर निकायों में कार्यरत कर्मचारियों से उनके मूल पद से उच्च पद का कार्य लेने की प्रथा पर सख्त रुख अपनाया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया गया है, जिसके तहत अब किसी भी नगर निकाय में कार्यरत कर्मचारी से उसके मूलपद से अधिक जिम्मेदारी वाला कार्य नहीं लिया जाएगा।  मुख्यमंत्री कार्यालय को ऑनलाइन संदर्भ संख्या 60000180127355 के माध्यम से एक शिकायत प्राप्त हुई थी, जिसमें यह उजागर किया गया था कि प्रदेश के कई नगर निकायों में कर्मचारियों से उनकी निर्धारित जिम्मेदारियों से अधिक काम लिया जा रहा है।  इस मामले पर 19 दिसंबर 2018 को संज्ञान लिया गया था, लेकिन अब इसे लेकर ठोस कार्यवाही सुनिश्चित की जा रही है। स्थानीय निकाय निदेशालय, गोमती नगर विस्तार, लखनऊ की ओर से यह निर्देश प्रदेश के समस्त नगर आयुक्तों, जलकल विभाग के महाप्रबंधकों, डिविजनल जल संस्थानों के प्रमुखों और नगर पालिका व नगर पंचायतों के अधिशासी अधिकारियों को भेजा गया है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि किसी भी कर्मचारी से उसके मूलपद से ऊपर के स्तर का कार्य लेना नि...