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कुशवाहा समाज की प्रगति में बाधक षड्यंत्रों का पर्दाफाश

दिनेश कुमार कुशवाहा

किसी भी युद्ध को जीतने के दो ही तरीके होते हैं—या तो अपनी तैयारी को इतना मजबूत बनाया जाए कि विरोधी पर भारी पड़ें, या फिर अपने सभी प्रतिद्वंद्वियों को समाप्त कर दिया जाए। जब कोई प्रतिद्वंदी ही नहीं रहेगा, तो जीत सुनिश्चित हो जाती है। दुर्भाग्यवश, कुशवाहा समाज में भी वर्षों से ऐसा ही खेल खेला जा रहा है।

स्वयं को समाज का स्वघोषित पूर्णकालिक कार्यकर्ता बताने वाले कुछ लोग, समाज की प्रगति की बजाय अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को साधने में लगे हैं। जब भी कोई व्यक्ति समाज के हित में कुछ बेहतर करने का प्रयास करता है, तो ये लोग अपनी "दुकान" बंद होने के डर से उसके खिलाफ षड्यंत्र रचते हैं। उनके इस नकारात्मक रवैये के कारण समाज के सच्चे सेवकों को या तो पीछे हटना पड़ता है या फिर बदनाम करने की साजिश का शिकार होना पड़ता है।

इन षड्यंत्रों का परिणाम यह है कि कुशवाहा समाज आज भी हाशिए पर है। समाज को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है, लेकिन कुछ स्वार्थी तत्व अपने निजी लाभ के लिए समाज की एकता और विकास में बाधा डाल रहे हैं। ऐसे लोग समाज के असली दुश्मन हैं, जिनका एकमात्र उद्देश्य समाज की प्रगति को रोककर अपनी स्थिति को सुरक्षित बनाए रखना है।

हम इस प्रकार के कुचक्रों की कठोर शब्दों में निंदा करते हैं और समाज के हर जागरूक व्यक्ति से आह्वान करते हैं कि वे इस षड्यंत्र को समझें, पहचानें और समाज की वास्तविक उन्नति के लिए एकजुट होकर आगे बढ़ें। समाज को आगे ले जाने के लिए हमें मिलकर कार्य करना होगा, न कि एक-दूसरे को गिराने की मानसिकता से।

अब समय आ गया है कि हम अपने समाज की शक्ति को पहचानें, षड्यंत्रकारियों से सावधान रहें और उन सभी प्रयासों का समर्थन करें जो वास्तव में समाज की उन्नति के लिए किए जा रहे हैं।

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