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मान्यता प्राप्त विश्व धरोहर के साथ छेड़छाड़?

  • बोधगया मंदिर अधिनियम, 1949 द्वारा भारतीय संविधान के अनुच्छेद (13, 14, 15, 25,26, 29, 49 और 51A(f)) का उल्लंघन करने..
  • बौद्ध धर्म की विरासत..
  • बौद्धों से छीनकर यूनेस्को द्वारा
  • मान्यता प्राप्त विश्व धरोहर के साथ छेड़छाड़ करने के सम्बन्ध में..
अरुण कुमार मौर्य, 
जिला अध्यक्ष मौर्य विकास समिति पूर्व जिला पंचायत सदस्य, जनपद भदोही, उत्तर प्रदेश बोधगया मंदिर अधिनियम-1949, महाबोधि मंदिर के प्रबंधन और नियंत्रण को हिंदू और बौद्ध प्रतिनिधियों के संयुक्त बोर्ड को सौंपता है। इसके तहत 9-सदस्यीय प्रबंधन समिति बनाई गई, जिसमें हिंदू बहुमत (5 हिंदू, 4 बौद्ध) रखा गया। इस समिति के अध्यक्ष हमेशा एक हिंदू ही होते हैं।
महोदय उक्त अधिनियम के कारण हिन्दू बहुल समिति बौद्धों को उनके अधिकारों से वंचित रखती है और यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त विश्वधरोहर के साथ छेड़छाड़ कर बौद्ध धर्म के मूल स्वरूप को बदलने का निरन्तर प्रयत्न कर रही है, जिससे बौद्ध धम्म का मूल अस्तित्व खतरे में पड़ता प्रतीत हो रहा है। उक्त अधिनियम संविधान के निम्नलिखत अनुच्छेदों का उलंघन करता हैः-

संविधान के अनुच्छेदों के उल्लंघन का विश्लेषण:
1- अनुच्छेद 13: मूल अधिकार
अनुच्छेद 13(1) मौलिक अधिकारों के विरुद्ध कोई भी कानून शून्य होगा।
संविधान का अनुच्छेद 13(1) कहता है कि कोई भी कानून जो संविधान के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, वह शून्य होगा।
बोधगया मंदिर अधिनियम, 1949 बौद्ध समुदाय के (धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार-अनुच्छेद 25-28) का उल्लंघन करता है क्योंकि यह अधिनियम मंदिर का प्रशासन हिंदू बहुल समिति को देता है, जबकि यह स्थल बौद्ध धर्म का केंद्र है। इस आधार पर यह अधिनियम अनुच्छेद 13 का उल्लंघन करता है।
2- अनुच्छेद 14: समानता का अधिकार
संविधान का अनुच्छेद 14 कहता है कि राज्य सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करेगा और किसी के साथ भेदभाव नहीं करेगा।
महाबोधि मंदिर का प्रशासन हिंदू बहुल समिति को देना स्पष्ट भेदभाव है। भारत में किसी भी अन्य धार्मिक स्थल (जैसे हिंदू मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा) का नियंत्रण दूसरे धर्म के हाथों में नहीं है, लेकिन बौद्धों के सबसे पवित्र स्थल को हिंदू बहुल समिति को सौंप दिया गया। यह स्पष्ट रूप से अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
3- अनुच्छेद 15: धर्म के आधार पर भेदभाव का निषेध।
अनुच्छेद 15 (1) कहता है कि राज्य धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं कर सकता। बौद्ध धर्म एक स्वतंत्र धर्म है, लेकिन बोधगया मंदिर अधिनियम, 1949 बौद्धों को उनके ही धार्मिक स्थल से वंचित करता है। अगर अन्य धर्मों के धार्मिक स्थलों का पूरा प्रबंधन उनके समुदाय के पास है तो बौद्धों को यह अधिकार क्यों नहीं? यह अनुच्छेद 15(1) का सीधा उल्लंघन है।
4- अनुच्छेद 25: धर्म की स्वतंत्रता
अनुच्छेद 25(1) हर व्यक्ति को अपने धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। बौद्धों को उनके ही सबसे पवित्र स्थल के प्रबंधन से वंचित करना उनकी धार्मिक स्वतंत्रता का हनन है। हिंदू बहुमत वाली समिति मंदिर के संचालन में बौद्ध परंपराओं को सीमित समाप्त कर सकती है। यह अनुच्छेद 25 का उल्लंघन है।
5- अनुच्छेद 26: धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता
अनुच्छेद 26 (ख): अपने धर्म विषयक कार्यों का प्रबंध करने का अधिकार
अनुच्छेद 26 (ख), यह अनुच्छेद सभी धार्मिक समूहों को अपने धार्मिक संस्थानों को स्वतंत्र रूप से संचालित करने का अधिकार देता है। बौद्ध धर्म एक स्वतंत्र धर्म है, लेकिन बोधगया मंदिर अधिनियम हिंदुओं को महाबोधि मंदिर के प्रबंधन में बहुमत देकर बौद्धों के इस अधिकार का हनन करता है।
अन्य धर्मों के धार्मिक स्थलों (जैसे, हिंदू मंदिर, मस्जिद, चर्च) के प्रशासन पर किसी अन्य धर्म का नियंत्रण नहीं है, फिर महाबोधि मंदिर पर हिंदू बहुमत क्यों? इस आधार पर, यह अधिनियम अनुच्छेद 26 का स्पष्ट उल्लंघन करता है।
6- अनुच्छेद 29: अल्पसंख्यक-वर्गों के हितों का संरक्षण
अनुच्छेद 29(1): अल्पसंख्यक समुदायों की संस्कृति और धरोहर की रक्षा
अनुच्छेद 29(1) कहता है कि किसी भी समुदाय की संस्कृति, भाषा या धरोहर को संरक्षित किया जाएगा।
महाबोधि मंदिर बौद्ध संस्कृति और धरोहर का सबसे बड़ा प्रतीक है। लेकिन यह मंदिर बौद्धों के नियंत्रण में न देकर उनकी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को कमजोर किया जा रहा है। यह अनुच्छेद 29 का उल्लंघन है।
7- अनुच्छेद 49: राष्ट्रीय स्मारकों और धरोहरों की रक्षा
अनुच्छेद 49 कहता है कि सरकार को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व की धरोहरों की रक्षा करनी चाहिए। महाबोधि मंदिर एक विश्व धरोहर स्थल (UNESCO द्वारा मान्यता प्राप्त) है, लेकिन इसे बौद्धों से छीनकर हिंदू बहुमत वाली समिति को देना इसके ऐतिहासिक महत्व और बौद्ध पहचान को खतरे में डालता है। इसलिए, यह अधिनियम अनुच्छेद 49 के संरक्षण सिद्धांतों के भी विपरीत है।
8- अनुच्छेद 51A(f): हमारी विरासत को सुरक्षित रखने का मौलिक कर्तव्य
अनुच्छेद 51A(f) कहता है कि हर नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह भारत की समृद्ध विरासत और संस्कृति की रक्षा करे। महाबोधि मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि विश्व धरोहर (UNESCO) में शामिल है। इसके प्रशासन में बाहरी हस्तक्षेप इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को खतरे में डालता है।
यह अनुच्छेद 51A(f) के खिलाफ है।
बोधगया मंदिर अधिनियम, 1949, भारतीय संविधान के कम से कम 8 महत्वपूर्ण अनुच्छेदों (13, 14, 15, 25, 26, 29, 49 और 51A) का उल्लंघन करता है। इन सभी अनुच्छेदों का अध्ययन करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यह अधिनियम पूरी तरह असंवैधानिक है।
1- यह बौद्धों के धार्मिक अधिकारों का हनन करता है।
2- यह समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है।
3- यह बौद्ध अल्पसंख्यकों के अधिकारों को कुचलता है।
4- यह भारत की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के विरुद्ध जाता है।
5- यह धार्मिक स्वतंत्रता और संस्थानों के स्वायत्त प्रबंधन को बाधित करता है।
6- यह एक ऐतिहासिक बौद्ध धरोहर को उसकी मूल पहचान से दूर करने की साजिश को बढ़ावा देता है।
अतः महोदय से विनम्र निवेदन है कि विश्व धरोहर बौद्ध विरासत की सुरक्षा के दृष्टिगत प्रकरण को गम्भीरता से लेते हुए इस असंवैधानिक अधिनियम (बोधगया मंदिर अधिनियम, 1949) को अवैध घोषित कर पूरी तरह निरस्त करते हुए महाबोधि मंदिर का पूरा प्रशासनिक नियंत्रण बौद्ध समुदाय को सौंपने के लिए उचित संवैधानिक कार्यवाही करवाते हुए बौद्ध धर्म के अधिकारों को दिलायें और संबन्धित कार्यवाही से अवगत कराने का कष्ट करें। 

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