कुछ पंक्तियाँ -मर्तबा
सुरेंद्र सैनी बवानीवाल "उड़ता"
कितना हुआ बेज़ार मर्तबा
खिला नहीं रुक्सार मर्तबा.
हाथ से रेत सा निकल रहा
वक़्त पर ना ऐतबार मर्तबा.
यूँ शहर मायूसी में डूब रहा
सोये पड़े सब अदार मर्तबा.
कुफ्त से दिल मेरा भर गया
निकले तो कैसे गुबार मर्तबा.
"उड़ता"क्यों मुज़ाइरा कर रहा
तुझे मिलेंगे ग़म हज़ार मर्तबा.
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