- "तर्क को कुचलकर और सत्य बोलने वालों को जेल भेजकर भगत सिंह के विचारों को क्या कुचल रही हैं..
- असली आजादी तब आएगी, जब समाज में समानता आयेगी..
मनोज मानव
भगत सिंह एक ऐसे क्रांतिकारी थे, जिन्होंने अंधविश्वास, धार्मिक पाखंड और शोषणकारी व्यवस्थाओं के खिलाफ न सिर्फ आवाज उठाई, बल्कि अपनी जान भी कुर्बान कर दी। उनका मानना था कि असली आजादी तब आएगी, जब समाज में समानता आयेगी।
तर्क और विवेक का चारों तरफ बोलबाला हो, और हर इंसान को बिना किसी जाति-धर्म और भेदभाव के सम्मान मिलेगा। इन्होने अपने लेख "मैं नास्तिक क्यों हूँ" में साफ कहा कि धर्म और अंधविश्वास लोगों को गुलाम बनाते हैं और शोषण को बढ़ावा देते हैं। लेकिन आज बीजेपी और आरएसएस की राजनीति उनके इन विचारों को ठोकर मारती दिख रही है।
हिंदू राष्ट्रवाद को हथियार बनाकर, तर्क को कुचलकर और सत्य बोलने वालों को जेल भेजकर ये देश को एक खतरनाक रास्ते पर ले जा रहे हैं? इस पर सभी को चिंतन करना चाहिए।
तर्क और विवेक पर भी सीधा हमला हो रहा है! 2020 में 67 पत्रकारों पर कार्रवाई हुई, और पिछले दशक में 154 पत्रकारों को गिरफ्तार या परेशान किया गया, ज्यादातर बीजेपी-शासित राज्यों में।
मुहम्मद जुबैर को तथ्य-जाँच के लिए और राहुल गांधी को असहमति जताने के लिए ही संघर्ष करना पड़ रहा है? क्या यह सिलसिला नहीं बताता है कि सत्य बोलना अब अपराध बन गया है!
मार्च 2025 की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत 33 देशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थन में 24वें स्थान पर है। मतलब, जनता भले आजादी की बात करे, लेकिन हकीकत में यह आजादी सिकुड़ रही है।
बीजेपी का यह रवैया तर्कसंगत बहस को कुचल रहा है और देश को एक ऐसी बहस में धकेल रहा है, जो सिर्फ उनकी सत्ता को मजबूत करे।
भगत सिंह की दृष्टि थी एक शोषण-मुक्त, समान और तर्कशील समाज की। लेकिन बीजेपी और आरएसएस की राजनीति इसे ध्वस्त कर रही है। जहाँ भगत सिंह अंधविश्वास को शोषण का हथियार मानते थे, वहाँ ये संगठन धार्मिक उन्माद फैलाकर वोट बटोर रहे हैं।
जहाँ वे तर्क और विवेक की बात करते थे, वहाँ असहमति को जेल में ठूँसा जा रहा है। जहाँ वे सामाजिक समानता के लिए लड़े, वहाँ ब्राह्मणवादी हितों को तरजीह दी जा रही है। और जहाँ उन्होंने निर्भीक अभिव्यक्ति को क्रांति का आधार बताया, यह विडंबना नहीं तो क्या है? बल्कि यह उनके बलिदान का अपमान है।
"इंकलाब जिंदाबाद" सिर्फ नारा नहीं, बल्कि एक आह्वान था शोषण, असमानता और पाखंड के खिलाफ लड़ने का। बीजेपी-आरएसएस की यह राजनीति देश को गर्त में ले जा रही है, और इसे रोकने के लिए हमें उनके विचारों को ढाल बनाना होगा। सवाल यह है? कि क्या हम उस क्रांति को जिंदा रख पाएँगे, या चुपचाप यह तमाशा देखते रहेंगे? दोस्तों समय जवाब माँग रहा है।

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