बस यूँ ही निकल गयी!
सुरेंद्र सैनी बवानीवाल "उड़ता "
वो नज़र नहीं थी ना दीद पूरी हुई
अधखुली आँखें ना उनींद पूरी हुई
आधी सी ज़िन्दगी यूँ ही गुजर गयी
ना ख़्वाब पूरे हुए ना नींद पूरी हुई.
आधी सी बन्दगी यूँ ही गुजर गयी
ना आस पूरे हुए ना उम्मीद पूरी हुई.
किसको बतलाता ये हालात अपने
ना अरमान पूरे हुए ना ज़िद पूरी हुई.
एक दिन चले थे दुनिया को बदलने
ना साथ पूरे हुए ना भीड़ पूरी हुई.
तिनकों में बिखरते सभी पल मेरे
घोसलों की तलब ना नीड पूरी हुई.
क्या से क्या सोचने लगे "उड़ता "
तेरे शब्दों की अगन ना दीद पूरी हुई..
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