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बहुजन समाज को गहरे अँधेरे में जाने से बचायें

Manoj Manav 

यूपी में दलितों और पिछड़ों पर हो रहे उत्पीड़न, अत्याचार, बुलडोजर राज, और न्याय के लिए दर-दर भटकते लोग यह दर्शाते हैं कि यह सब सरकार की नाकामी हैं लेकिन बहुत ज्यादा नहीं, बल्कि एक सुनियोजित षड़यंत्रकारी व्यवस्था की सफलता है, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की विचारधारा से प्रेरित है। 

यह व्यवस्था समाज को जाति और धर्म के आधार पर बाँटकर सत्ता को स्थायी रूप से अपने हाथ में रखने का प्रयास कर रही है। उदाहरण के लिए, हाथरस कांड (2020) में एक दलित युवती के साथ सामूहिक बलात्कार और उसकी मृत्यु के बाद पुलिस ने जबरन उसका अंतिम संस्कार कर दिया, जिससे न्याय प्रणाली में जातिगत भेदभाव साफ झलकता है। 

इसी तरह, उन्नाव बलात्कार मामले में दलित-पिछड़े वर्ग की पीड़िता को लंबा संघर्ष करना पड़ा, और प्रभावशाली जातियों के दबाव में मामला दबाने की कोशिश हुई। 

"बुलडोजर राज" के तहत भी अल्पसंख्यकों और निचले तबके के लोगों के घरों को चुन-चुनकर तोड़ा जा रहा है, जैसा कि 2022 में प्रयागराज में एक मुस्लिम कार्यकर्ता के घर को ध्वस्त करने के मामले में देखा गया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी ठहराया। ये घटनाएँ संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हैं, जो कमजोर वर्गों को दबाने के लिए बनाई गई हैं। 

आरएसएस की सोच समाज को जाति और धर्म के आधार पर विभाजित करने पर केंद्रित है, जिसका उद्देश्य हिंदुत्व के नाम पर कट्टरता को बढ़ावा देना है। इससे बहुसंख्यक वर्ग का एक हिस्सा कट्टर हिंदू बनता जा रहा है, और जवाब में अल्पसंख्यक समुदायों में भी कट्टरता बढ़ रही है। इस नफरत का सबसे ज्यादा नुकसान समाज के कमजोर तबकों, दलितों, पिछड़ों और गरीबों को हो रहा है, जो हिंसा और उत्पीड़न का शिकार बनते हैं। 

कम पढ़े-लिखे लोग इस प्रचार के आसान शिकार बन जाते हैं, जैसे कि 2020 के दिल्ली दंगों में सोशल मीडिया पर फैलाए गए भड़काऊ संदेशों से प्रभावित होकर लोग हिंसा में शामिल हो गए। इससे समाज में खतरा और आतंक बढ़ रहा है, और इसका सबसे बड़ा असर बहुजन समाज पर पड़ रहा है, जो अपनी ताकत खोता जा रहा है।

जब लोग खुद को "द ग्रेट चमार," "द ग्रेट अहीर," "द ग्रेट पासी," या "द ग्रेट कोइरी" जैसे नामों से श्रेष्ठ मानने लगते हैं, तो यह व्यवस्था इसी आधार पर न्याय करने लगती है कि कौन सी जाति ऊँची है और कौन नीची। इससे ऊँची मानी जाने वाली जातियों को न्याय मिलता है, जबकि निचली जातियों को दबाया जाता है। यूपी में कई मामलों में दलितों की शिकायतों को नजरअंदाज किया जाता है, और प्रभावशाली जातियों के खिलाफ कार्रवाई में देरी होती है।

यह व्यवस्था एक जाति को दूसरी जाति के खिलाफ भड़काकर समाज को और टुकड़ों में बाँट रही है, ताकि सत्ता में बैठे लोग इसका फायदा उठा सकें। एक विभाजित समाज कभी एकजुट होकर सत्ता के खिलाफ खड़ा नहीं हो सकता, जिसके चलते बहुजन समाज इतने टुकड़ों में बँट रहा है कि वह अपनी ताकत खो लगातार खो रहा है और दया के टुकड़ों (राशन) पर निर्भर होने के लिए विवश है। इसका लाभ चंद मुठ्ठी भर लोगों को होगा, वें हमेशा के लिए सत्ता पर काबिज बनें रहेंगे।

इस सुनियोजित व्यवस्था से बचने का एकमात्र रास्ता है जाति और धर्म आधारित श्रेष्ठता को त्यागना और बहुजन महापुरुषों जैसे डॉ. बी.आर. आंबेडकर, ज्योतिबा फुले, पेरियार, और कांशीराम के आंदोलन को पुनर्जनन करना। इन महापुरुषों ने जाति और धर्म के आधार पर बँटे समाज को एकजुट करने की कोशिश की थी। 

आंबेडकर का संदेश "शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो" और पेरियार का सामाजिक समानता का योगदान आज भी उतना ही प्रासंगिक है। हमें इस खतरे को पहचानना होगा और जातिगत गर्व व धार्मिक कट्टरता को छोड़कर बहुजन आंदोलन को फिर से जीवित करना होगा। तभी हम देश और संविधान को विनाश से बचा सकते हैं और इसे विकास की ओर ले जा सकते हैं। 

अगर ऐसा नहीं हुआ, तो यह व्यवस्था समाज को और गहरे अंधेरे में डुबो देगी, जहाँ से निकलना लगभग असंभव होगा।

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