(बाल कविता)
सुरेंद्र सैनी बवानीवाल "उड़ता"
चलती रेलगाड़ी छूक-छूक-छूक-छूक
कहें बिचले स्टेशन रुक-रुक-रुक-रुक
तेज चलती हवायें मन को भाएं
देख भागते पेड़ मन खुश हो जाए
सवारियां रेल के अंदर चढ़ती
अंदर आ धक्का-मुक्की करती
बेशक रेल-डब्बे में शौर होता
लेकिन कोई नहीं बोर होता
नए-नए मुसाफिर आते
बच्चे चीखते और चिल्लाते
चलो "दर्श"सबकुछ भूल जाएँ
इस रेल सफर का आनंद उठायें
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