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गरीब की पुश्तैनी ज़मीन पर खेला गया फर्जीवाड़े

कलम के कांटे से

फाइलें गायब, स्टाम्प पेपर झूठा.
नगर निगम की मेज़ पर बिक गया इंसाफ!..

गरीब की पुश्तैनी ज़मीन पर खेला गया फर्जीवाड़े का महाभारत..
न्याय की चौखट नहीं..
दलाली का दरबार बन चुकी हैं नगर निगम की कुर्सियां..

अयोध्या नगर निगम अब ‘नगर सेवा’ नहीं, ‘धंधा निगम’ बन चुका है। जहां अफसर कलम नहीं, कब्जे बेचते हैं और रजिस्टर में नाम नहीं, रिश्वत दर्ज होती है। 
गरीब की पुश्तैनी ज़मीन पर खेला गया फर्जीवाड़े का महाभारत, जिसमें ‘फाइलें’ खुद गवाही देने से लापता हैं और अफसर ‘भ्रष्टाचार’ के चारण बन बैठे हैं। 
अमानीगंज की गलियों में अब कानून नहीं, मिलीभगत का बोलबाला है।
  • नगर निगम की कुर्सियाँ अब न्याय की चौखट नहीं.. दलाली का दरबार बन चुकी है.. 
  • यहां इंसाफ माँगना वैसा ही है.. (जैसे सूखे कुएं में मछली ढूँढना) 
  • “गायब फाइल” अब नगर निगम की परंपरा है.
  • हर पीड़ित की एक कहानी, 
  • ..और हर अफसर की एक तिजोरी..
नगर निगम के अधिकारी इतने मासूम हैं कि 2022 में बने स्टाम्प को 2017 के दस्तावेज़ पर लगाकर भी आंख नहीं झपकते। इनकी कार्यशैली देखकर लगता है कि ये सिर्फ 'फर्ज़ी' नहीं, 'फारसी' भी जानते हैं क्योंकि जो खेल ये खेलते हैं, वो आम जनता की समझ से बाहर है।

यहाँ 'संपत्ति' नहीं, 'सांठगांठ' नामांतरण करवाई जाती है। और जब कोई पीड़ित दरवाज़ा खटखटाता है, तो जवाब मिलता है—"फाइल कहाँ है, हम भी खोज रहे हैं!" सच तो ये है कि फाइलें नहीं, फर्ज़ीवाड़े की जड़ें दबा दी जाती हैं।
शहर की गलियों में अफवाह है कि अब नगर निगम में अगर कोई काम बिना रिश्वत के हो गया, तो उसे ‘सिस्टम की गलती’ माना जाएगा।
  • अब सवाल ये नहीं कि भ्रष्टाचार हो रहा है..
  • सवाल ये है कि क्या नगर निगम में कोई ईमानदार बचा भी है?

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