उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में 3 करोड़ रुपए से बनी पानी की टंकी ने भ्रष्टाचार की बुनियाद पर टिकी अपनी नियति को बखूबी निभाया टेस्टिंग में ही गर्व से ढह गई!
जैसे ही पानी भरा गया, टंकी ने प्रेशर झेलने की बजाय पूरे आत्मसम्मान के साथ ज़मीन पर लोट लगा दी।
स्थानीय लोग चौंके जरूर, पर अफसरों और ठेकेदारों के चेहरों पर अदृश्य मुस्कान थी आखिर फिर से नया टेंडर आएगा, नया खेल चलेगा!
3 करोड़ की लागत वाली यह टंकी इतनी नाजुक निकली कि देख कर टूथपेस्ट की खाली ट्यूब भी कुंठा में चली जाए।
शायद टंकी ने भी सोचा होगा — "इतने घोटाले झेलने से अच्छा खुद ही फट जाऊं!"
अब प्रशासनिक गलियारों में गहन चिंतन चल रहा है — दोष किसका था?
टंकी का, पानी का या जनता की उन मासूम उम्मीदों का जो हर बार विकास के नाम पर छलनी कर दी जाती हैं।
अगर यही विकास है, तो अगली बार सलाह दी जानी चाहिए — टेस्टिंग पानी से नहीं, गुलाबजल से हो! कम से कम टंकी शहीद होने से पहले महक तो जाती!

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