सुरेंद्र सैनी बवानीवाल "उड़ता"
या तो पूरा करते या अधूरा छोड़ देते
मैं रूबरू हूँ ना कि हिजाब जैसी हूँ
या तो मुझे पीते या अधूरा छोड़ देते
है नशा मुझमें कि मैं शराब जैसी हूँ
या तो मुझे देखते या आँख बंद करते
मैं नैनों से बहती हुई चिनाब जैसी हूँ
या तो कुछ कहते या चुप हो जाते
मैं देखती तेरी नादानी इताब जैसी हूँ
या तो मुझे बाचते या सीने पर रखते
कर पढ़ने की कोशिश किताब जैसी हूँ
या तो महसूस करते या डूब जाते
मैं किसी महकते हुए गुलाब जैसी हूँ
हर लफ्ज़ तेरे सामने रख दिया मैंने
मैं आते हुए विचारों के तालाब जैसी हूँ
मेरे हर जज़्बात हैं फूलों के मानिंद
तेरी हूँ "उड़ता"कि मैं शबाब जैसी हूँ
Comments
Post a Comment