Manoj Manav
यह गजब का संयोग है कि एक ओर 150 वर्ष पुरानी सामाजिक कुरीतियों, जाति व्यवस्था और महिलाओं के प्रति भेदभाव को उजागर करने वाली फिल्म 'फुले' रिलीज होती है, तो दूसरी ओर ठीक उसी समय कश्मीर में एक आतंकवादी घटना घटित हो जाती है, जिसमें हिंदू धर्म के नाम पर लोगों को निशाना बनाया जाता है। इसके बाद हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा धर्म के आधार पर लोगों को संगठित करने की गतिविधियां तेज हो जाती हैं, और सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं शुरू हो जाती हैं और इसी बीच बहुजन समाज के लिए मार्गदर्शक साबित होने वाली फ़िल्म फुले मिडिया और लोंगो के बीच से गायब होकर दब जाती है।
दोनों विषयों में एक समानता यह है कि 'फुले' फिल्म धार्मिक भेदभाव को उजागर करती है। यह शूद्र वर्ण, अर्थात् दलित और पिछड़ी जातियों तथा महिलाओं के लिए धर्म के भीतर लड़कर हक-अधिकार दिलाने की लड़ाई को दर्शाती है, जो उस समय की सच्चाई से रूबरू कराती है। वहीं, आतंकवादी घटना के बाद हिंदू धर्म के नाम पर लोगों को जाति व्यवस्था से ऊपर उठकर संगठित करने पर जोर दिया जाता है।
फिल्म एक ओर ब्राह्मणवाद और जातिगत शोषण की सच्चाई उजागर करती है, तो दूसरी ओर यह सवाल उठाती है कि क्या धार्मिक पहचान के नाम पर एकजुटता सामाजिक न्याय की दिशा में ले जाएगी? आज के समय में, जब आतंकवादी घटना के बाद हिंदू धर्म को संगठित करने की कोशिशें हो रही हैं, 'फुले' का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। आतंकवाद एक वैश्विक समस्या है, जो किसी एक धर्म से जुड़ा मसला नहीं है, किंतु इसे आधार बनाकर धार्मिक विभाजन को बढ़ावा देना सामाजिक सद्भाव और लोकतंत्र, दोनों के लिए खतरा है।
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