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पहलगांव हमला

मौत का मंजर बार बार क्यूँ, अपने हिस्से ही आता है

खेल खून की होली वाला, अपने हिस्से क्यूँ आता है

शांति के रक्षक हैं तो क्या, केवल श्वेत कपोत उड़ाएं

ओर अपने घर की रक्षा में ,हम गैरों पर नजर लगाएं

अपनो की रक्षा का जिम्मा, क्या अधिकार नही है अपना

हर हमले के बाद समीक्षा, केवल है बस अपना जिम्मा

कब तक यूँ कब तक, आखिर कब तक मौन रहेंगे हम

अपनों की लाशों पे बैठ यूँ , कब तक शोक करेंगे हम

कभी तो उत्तर देना होगा, ईंट को पत्थर देना होगा

तो सब मरने का इतंजार क्यूँ, आज अभी कुछ करना होगा

मुट्ठी भर इन जल्लादों से, डरना वरना बंद करो अब

या तो खुद को खत्म करो  ,या उनका चैप्टर बंद करो अब

नक्शे में जब तक नाम रहेगा, यूँही कत्लेआम रहेगा

एक के बदले चार नही अब, चार को चौसठ बार करो अब

8, 28, 13, 32, 36, 40, बारबार ही अपने हमसे ले जाता है 

मौत का मंजर बार बार क्यूँ  ,अपने हिस्से ही आता है

खेल खून की होली वाला,अपने हिस्से क्यूँ आता है.

पूछ रहा है मरने वाला, हर बार हमें क्यूँ भारतीय होना 

भेंट बली की दे जाता है, खून से लथपथ सीने फिर से 

माँ की गोद मे दे जाता है माँ की गोद में दे जाता है

क्यूँ हैं हम मजबूर से इतने, सब कुछ होकर भी बोने क्यूँ

कभी 26/11, अक्षरधाम, कभी पुलवामा कभी पहलगांव

कभी पुंज बटालिक सेक्टर में, कभी अमृतसर की गलियों में

क्या है ये कोई दाव शियासी, या जयचंदों का घेरा है

गर दोनों में से एक भी है तो, सुस्त हमारा क्यूँ पहरा है

याद करो वो भाषण अपने जो पहली सरकारों में बोले थे

वही बना माहौल ये फिर क्यूँ क्या अब या पहले बोने थे

कुछ तो हो मालूम हमे भी, चुभता खंजर किसका ह ये

दर्द भरा ये मंजर फिर से आखिर फिर से क्यूँ आता है

मौत का मंजर बार बार क्यूँ, अपने हिस्से ही आता है

खेल खून की होली वाला, अपने हिस्से क्यूँ आता है

परिणामों की चिंता करना, केवल कायरता होती है

सोमनाथ का किस्सा फिर से, यूँही दोहराना बंद करो

तोप मिशाइल बम बंदूके केवल उनके पास नही हैं

याद करो वो भीष्म पितामह, जो इच्छा मृत्यु लिए खड़ा था

एक अधर्म के साथ ने उनको, भी बाणों पर सुला दिया था

हाँ ये सच है युद्ध का मंजर, बलिदानों का परिचायक है

पर गर डरता अभिमन्यु तो, ये परिणाम नही होना था

अधर्म की यूँ हार ना होती, धर्म विजय गुणगान ना होता

सब कुछ होता कुरुक्षेत्र में, पर गीता का ज्ञान ना होता

नजरें लगाए बैठे हैं हम, कब क्या ओर कितना होता है

मौत का मंजर बार बार क्यूँ, अपने हिस्से ही आता है

खेल खून की होली वाला, अपने हिस्से क्यूँ आता है

अपने हिस्से क्यूँ आता है, अपने हिस्से क्यूँ आता है

 सत्येन्द्र जाखड़ “अनाड़ी” बिगोवा, चरखी दादरी, हरियाण

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