मंजुल भारद्वाज
सृजन शक्ति अकूत शक्ति है
एक सूक्ति,कविता,चित्र,छवि
नाटक,उपन्यास,कहानी,लेख
या कोई भी सृजन कर्म
आपको अकूत शक्ति से भर देता है!
यह सृजन शक्ति
किसी भी सत्ता से ज्यादा शक्तिशाली होती है
क्योंकि यह शक्ति जनमानस को बदल
वैचारिक क्रांति की बयार चलाती है
जो किसी भी सत्ता के बूते की बात नहीं !
हम सृजक इस शक्ति का क्या करते हैं
वाहवाही से फूल जाते हैं
प्रसिद्धि और पैसा कमा लेते हैं
रहा सहा भोग विलास में खपा देते हैं!
दरअसल सृजन शक्ति
सृजन तरंगों का झरना है
यह किसी भी अणु बम से
ज्यादा विकिरण करता है
हमारा परिसर,घर,समाज
ऐसे विकिरण के लिए तैयार नहीं होता
ना ही उसके पास इस विकिरण को
उत्प्रेरित करने का कोई ढांचा है
ना एहसास है,ना आभास है
लट्ठ है हमारा परिसर
इसलिए सृजनकार को
जीवन व्यवहार में लट्ठम लठ्ठा कर
अपने जैसा बना लेता है!
सृजन स्पंदन व्यक्तित्व को
स्वयं इस ऊर्जा को
सार्थक दिशा की ओर ले जाना होता है
वाहवाही, प्रसिद्धि ,पैसे के परे
एक सृजन स्पंदित विश्व को सृजित करना है
एक सतत वैचारिक क्रांति के लिए !
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