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आउटसोर्सिग निगम वास्तव में एक भुलावा और छलावा?

  • आउटसोर्सिंग निगम का गठन कितना रहेगा कारगर!..
  • इससे कुछ भी बदलने वाला नहीं है..
  • सिर्फकुछ बाबूगिरी के चैनल बदल जायेंगे..

उoप्रo सरकार की पूर्व घोषणा के अनुसार आउटसोर्स सेवा के लिए एक निगम बनाने के निर्णय को अमल में लाने हेतु मंजूरी मिल गई है। 

प्रदेश की योगी सरकार का कहना है कि यह निगम इसलिए बनाया जा रहा है जिससे आउटसोर्सिंग कर्मचारियों का शोषण न हो सके और उनके श्रम अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा को संरक्षण मिल सके। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कहना है कि यह निगम प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के साथ-साथ आउटसोर्सिंग कर्मचारियों के जीवन में स्थायित्व और भरोसा सुनिश्चित करेगा। 

अभी तक मौजूदा व्यवस्था में आउटसोर्सिंग एजेंसियों का चयन के माध्यम से लोगों को विभिन्न सरकारी सेवाओं के लिए प्रवेश दिया जाता है। चूंकि इन्हें वेतन देने, भविष्यनिधि और अन्य श्रमिक सुविधाओं के लिए उन कम्पनियों पर ही आश्रित रहना पड़ता था जिस कम्पनी को टेंडर मिलता था जो श्रमिकों की सप्लाई करती है। जिसके एवज में सरकार उसके खाते में प्रति व्यक्ति धनराशि ट्रांसफर करती है। 

जब कम्पनी बदल जाती थी तो उसके लोगों को भी हटा दिया जाता था क्योंकि दूसरी कम्पनी के लोगों को जब रखा जायेगा तो निश्चित रूप से उसके यहां जो लोग पंजीकृत होंगे वही काम करेंगे। इसकी वजह से आये दिन विवाद और धरना प्रदर्शन आन्दोलन भी होता था जिसकी वजह से सरकार के सामने असहज स्थिति होती थी साथ ही काम में भी बाधा पहुंचती थी।

लेकिन जो निगम कम्पनी एक्ट के तहत बनाया जायेगा वह भी सीधे खुद इस कार्य में भागीदारी करने के बजाय एजेन्सियों का चयन करेगा और पूर्व की भांति एजेंसियों का चयन जेम पोर्टल के माध्यम से किया जायेगा। 

निगम में मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स और एक महानिदेशक की नियुक्ति की जाएगी और मंडल व जिला स्तर पर भी समितियों का गठन होगा।

यह चयन तीन साल के लिए किया जायेगा लेकिन तीन साल बाद जब दूसरी कम्पनी आयेगी तो फिर उस कम्पनी के श्रमिक की स्थिति बही होगी जो पहले होती रही है। बताया जा रहा है कि अच्छे श्रमिकों को उनके अनुभव के लिए विचार-विमर्श आउटसोर्सिंग निगम का गठन कितना रहेगा कारगर बेटेज दिया जायेगा। 

अब सवाल है कि यह वेटेज कहां काम आयेगा। दूसरे प्रदेश में लगभग 10 लाख ठेका मजदूर हैं जो निविदा के माध्यम से विभिन्न विभागों में कार्य कर रहे हैं उनके बारे में तो यह आउटसोर्स भी नहीं लागू होता है। उन मजदूरों का क्या होगा?

आउटसोर्सिंग के माध्यम से जो लोग कार्य कर रहे हैं। वह सभी लोग रिक्त पदों के सापेक्ष में ही काम कर रहे हैं। प्रदेश में लगभग 6 लाख ऐसे आउटसोर्सिंग वर्कर्स हैं जो कार्यरत हैं। जो सरकारी कर्मचारियों की संख्या के लगभग आधे हैं। इसका सीधा अर्थ तो यही है कि इतने पद प्रदेश में रिक्त हैं या इतने पदों की जरूरत है। 

यदि ऐसा न होता तो इतने लोगों को काम देने की जरूरत ही नहीं रहती। यदि एक ही श्रमिक को लम्बे अर्से तक काम देना है भले ही कम्पनी बदल जाये तो उसका क्या अर्थ रह जायेगा। इससे बेहतर है कि उन पदों पर भर्ती क्यों न कर ली जाये। 

आउटसोर्सिंग के जरिए एक ही काम के लिए जो मानदेय, वेतन दिया जायेगा उसी काम के लिए यदि नियुक्ति के बाद वेतन बनेगा तो वह उसकी तुलना में दस गुना से कहीं अधिक होगा और अन्य सुविधाएं भत्ते भी उसे मिलेंगे। सरकार इन जिम्मेदारियों से बचने के लिए नाहक की कवायद कर रही है। इससे कुछ भी बदलने वाला नहीं है सिर्फकुछ बाबूगिरी के चैनल बदल जायेंगे। 

यह निगम एक रेगुलेटरी बाडी के रूप में काम करेगा जो सिर्फ एजेन्सियों पर नकेल डालने का काम करेगा। यानी यह निगम एजेन्सियों को ब्लैकलिस्टिंग, डिबारमेंट, पेनाल्टी एवं वैधानिक कार्यवाही सुनिश्चित करेगा। लेकिन उन एजेन्सियों के तहत तो काम श्रमिक ही कर रहा है। एजेन्सी ब्लैकलिस्ट होगी तो उसका श्रमिक तो चला जायेगा। क्या एजेन्सी जिसका श्रमिक है वह डिबार हो जायेगी और उसका आदमी काम करता रहेगा?

जहां तक आउटसोर्सिंग सेवाओं में आरक्षण का प्रश्न है वह एक बड़ा सवाल पहले से ही रहा है। सरकार ने कभी भी यह नहीं कहा कि वह आउटसोर्सिंग में आरक्षण नहीं दे रही है उसका हमेशा से यही कहना रहा कि यह शासनादेश है कि 'मैन पावर' की सप्लाई में आरक्षण लागू होगा। इस तकनीकी शब्द के मायने में ही असली खेल होता है, जब कहा जाता है कि यह तो मैनपावर की सप्लाई ही नहीं थी। तीन साल की बात तो इसलिए की जा रही है क्योंकि यदि यह पांच साल का कर दिया जाये तो सरकार को उन श्रमिकों को ग्रेच्युटी देनी होगी।

देश और प्रदेश में बेरोजगारों की पूरी फौज है इसलिए जितना वेतन दे रहे हैं उससे भी कम वेतन पर लोग काम करने के लिए मिल ही जायेंगे इसलिए सरकार को चिन्ता करने की जरूरत ही नहीं रह गई है। 

काम के घंटे तो पहले भी जहां यह श्रमिक काम करते थे औपचारिक रूप से तय थे लेकिन जो अनौपचारिक रूप से काम लिया जाता है उसका भुगतान कौन करेगा?

आउटसोर्सिंग एक तरह से देश और प्रदेश के नागरिकों की बेरोजगारी का मजाक उड़ाना है। यह एक ऐसी गाजर है जिसकी लालच में लोग काम किये जा रहे हैं कि एक न एक दिन वे सरकारी हो जायेंगे। भले ही उनके एग्रीमेंट में इसका कोई प्रावधान नहीं है। 

सरकारी विभाग तक उनकी पहुंच ही मायने रखती है कि दुनिया की नजर में वे सरकारी कर्मचारी हैं लेकिन वास्तव में आउटसोर्स कर्मी जब कभी भर्ती के दिन आयेंगे तब तक उनकी उम्र गुजर चुकी होगी और वे सरकारी भर्ती के अयोग्य हो चुके होंगे। कहा जा रहा है कि उन्हें नौकरी से निकाला नहीं जायेगा लेकिन ऐसा तो है नहीं कि एक ही एजेन्सी 58 साल की आयु तक के लिए काम करेगी। यदि एक ही व्यक्ति 58 साल तक काम करेगा तो फिर दूसरी एजेन्सी की जरूरत कहां रह जायेगी और निगम की ही क्या जरूरत रह जायेगी। 

सरकार कहती है कि नियमित पदों के सापेक्ष आउटसोर्सिंग नहीं रखा जायेगा तो क्या 6 लाख आउटसोर्सिंग कर्मचारी क्यों रखे गए हैं? क्या राजकोष का धन नेकी कर दरिया में डालने के लिए हैं?

आउटसोर्सिग निगम वास्तव में एक भुलावा और छलावा है। सब कुछ वही रहेगा एक मुलम्मा जरूर चढ़ा दिया गया है। जहां तक कम्पनी के गठन और निगरानी तंत्र का सवाल है इसमें एजेन्सियों पर कुछ नकेल तो लगेगी लेकिन यह महज एक कवायद साबित होगी। 

यह आउटसोर्सिंग कम्पनियों से आये श्रमिकों के लिए कितनी कारगर होगी यह तो आने वाला समय ही बतायेगा।

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