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सत्ता हमेशा कलाकार से डरती है !

कला का जीवन 

"जनसत्ता 25 जुलाई, 2014 : सत्ता हमेशा कलाकार से डरती है, चाहे वह सत्ता तानाशाह की हो या लोकतांत्रिक व्यवस्था वाली। तलवारों, तोपों या एटम बम का मुकाबला यह सत्ता कर सकती है, पर कलाकार, रचनाकार, नाटककार, चित्रकार या सृजनात्मक कौशल से लबरेज व्यक्तित्व का नहीं। दरअसल, कलाकार मूलत: विद्रोही या क्रांतिकारी होता है और सबसे अहम बात यह है कि उसकी कृति का जनमानस पर अद्भुत प्रभाव होता है। इसलिए ‘कलाकार’ को सत्ता के पैरों तले रौंदा नहीं जा सकता। सत्ता ने कलाकार से निपटने के लिए उसकी प्रखर बुद्धि, चेतना और गजब के आत्मविश्वास की पहचान कर उसके अंदर के भोगी व्यक्तित्व को शह, लोभ, लालच और प्रश्रय देकर उसे राजाश्रित बनाया और सबसे बड़े षड्यंत्र के तहत सदियों से उसके समयबद्ध कर्म करने की क्षमता पर प्रहार किया और जुमला चलाया- ‘अरे भाई, ये क्रिएटिव काम है’ और क्रिएटिव काम समयबद्ध नहीं हो सकता... इसका समय निर्धारण नहीं हो सकता! पता नहीं कब पूरा हो! मजे की बात है कि सत्ता के इस षड्यंत्र को ‘कलाकार वर्ग’ समझ ही नहीं पाया और ऐसा शिकार हुआ है कि बड़ी शान से इस जुमले को दोहराता है ‘अरे भाई ये क्रिएटिव काम है!’ वह इस जुमले को सुन और बोल कर आनंदित और आह्लादित होता है, बिना किसी तरह का विचार किए!

कलाकार वर्ग एक बार भी विचार नहीं करता या अपने आप से प्रश्न नहीं पूछता कि क्या कला या सृजन का समय से पहले या समय से अभिव्यक्त होना आवश्यक नहीं है! जो अपनी कला से समय को न बांध पाए, वह कलाकार कैसा? सदियों से पढ़ने-पढ़ाने के पाठ्यक्रम की पुस्तकों से लेकर आर्ट गैलरी तक में किस्से, गुफ्तगू मशहूर हैं- ‘अरे भाई, ये क्रिएटिव काम है और क्रिएटिव कर्म का समय निर्धारण नहीं हो सकता!’

सत्ता वर्ग की यह साजिश कलाकारों के डीएनए में घुस गई है कि कलाकार वही जो महाआलसी हो, आकार, वेशभूषा से सामान्य न दिखे, जिसका चेहरा और आंखें बालों से बेतरतीब ढकी हों, जो समयबद्ध सृजन न करे, जीवन में समय का अनुपालन न करे! सत्ता के लोलुपों, मुनाफाखोरों ने उसे ऐसा बनाया और ऐसा ढांचा खड़ा किया है, ऐसी व्यूह रचना की है कलाकारों के इर्द-गिर्द कि उसके बाहर वे देख ही नहीं पाते। मसलन, कलाकृति को बोली लगा कर महंगा कर देना, जनता से कटे और विशेष वर्ग के अनुकूल प्रदर्शनी-स्थल या आर्ट गैलरी में प्रदर्शन। आम जनता को कला की क्या समझ! यानी पूरा मामला विशेष होने और बनने का हो जाता है और ऊपर से सत्ता और बाजार की मेहरबानियां, जिसके अहसान और बोझ से ‘कलाकार वर्ग’ ताउम्र निकल नहीं पाता। जिंदगी के शोषण, तफावत, बगावत, विद्रोह की आवाज, न्याय की पुकार, हक और बराबरी की चीख अपने ही कैनवास के दायरे में कैद हो जाती है। शोषण के प्रकार और दमन के धब्बे, अदृश्य आकार में निर्जीव मुर्दे की भांति टंगे रहते हैं और घोड़े या महिला के अंग-प्रत्यंग, उसका रंग-रूप, आकार और उसका वक्षस्थल, यानी सारी भोग्य सामग्री सुंदरता, ‘अस्थेटिक’, ‘क्रिएटिव फ्रीडम’ के नाम पर कैनवास पर उभर आती है और नहीं उभरती है कैनवास पर वह है ‘कला’!

जरा ठहर कर ‘कलाकार’ विचार करें कि उनकी कृति को कौन खरीदता है और वह अमीर वर्ग उस कृति का क्या करता है, उसे कला का सम्मान या दरजा देता है या रंग-रोगन की वस्तु समझ कर अपने गलीचे के ऊपर दीवार पर टांग देता है या उसके जीवन से उसका कोई संबंध होता है! कला जो जीवन से कटी हो, वह कला नहीं होती! सत्ता और बाजार के इस षड्यंत्र से ‘कलाकार वर्ग’ को निकलने और अपनी कला को जीवन और उसके समग्र अहम पहलुओं से जोड़ने की आवश्यकता है। सबसे बड़ी बात समयबद्ध होने की जरूरत है। किसी भी कलाकार की आत्मकथा पढ़ने के बाद आमतौर पर एक ही तरह की बात उभर कर सामने आती है कि जीवन में उसने मौज-मस्ती कैसे की, महंगी शराब का लुत्फ कैसे उठाया! लेकिन उस आत्मकथा से गायब होता है कला और उसे साधने का हुनर, शिल्प, तप और समयबद्ध सृजन प्रतिबद्धता!

अमीर वर्ग साल में ‘किसी कलाकार’ की कितनी कृतियां खरीदता है? चूंकि खरीदार सीमित हैं, इसलिए कलाकार का उत्साह समयबद्ध ‘कृति’ के सृजन को नकारता है। कलाकार को ‘समयबद्ध’ होकर जीवन को बेहतर बनाने वाली कलाकृति का सृजन करने के लिए सत्ता के षड्यंत्रों से बाहर निकलने की जरूरत है। अपनी राजनीतिक भूमिका के सक्रिय निर्वहन की प्रतिबद्धता का समय आवाज दे रहा है हर कलाकार और रचनाकार को। इस चेतना की आवाज को सुनने का हुनर हर कलाकार को सीखना है और जन-मानस की चेतना को जागृत कर उसे शोषण-मुक्त होने के लिए उत्प्रेरित करने वाली कलाकृतियों का समयबद्ध सृजन करना है! "


-मंजुल भारद्वाज

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