तुग़लक़ : एक अलौकिक अविस्मरणीय प्रस्तुति
लखनऊ, उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी, लखनऊ तथा उर्दू मास कम्युनिकेशन एंड मीडिया सेंटर द्वारा त्रैमासिक प्रशिक्षण के अंतर्गत गिरीश कर्नाड द्वारा लिखित प्रसिद्ध नाटक ‘तुग़लक़’ का भव्य मंचन किया गया। प्रस्तुति का निर्देशन ख्यातिप्राप्त रंग निर्देशिका चित्रा मोहन ने किया, जबकि डॉ. सीमा मोदी ने सह निर्देशन एवं मंच प्रबंधन का दायित्व निभाया।
कार्यक्रम का उद्घाटन उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी के सेक्रेटरी जनाब शौकत अली साहब ने दीप प्रज्वलन कर किया। उन्होंने उपस्थित विशिष्ट जनों और महिला प्रतिभाओं से भी दीप प्रज्वलन करवा कर कार्यक्रम की गरिमा को बढ़ाया। उद्घाटन भाषण में उन्होंने कहा कि "उर्दू ज़बान न केवल हमारे अदब, तहज़ीब और प्रेम की भाषा है बल्कि यह भाईचारे और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक भी है। उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी उर्दू भाषा के संरक्षण व संवर्धन के लिए तत्पर है।"
शमा रोशन में श्रीअरविंद श्रीवास्तव जी रिटायर्ड न्यायाधीश पटना हाई कोर्ट ,रिटायर्ड आईं ए एस अनीता भटनागर जैन , डीजी पीएसी आर के स्वर्णकार आई पी एस, मोहतरमा शीला बरनवाल साहिबा झारखंड में गायत्री परिवार की हेड ने की।
डॉ. सीमा मोदी ने स्वागत भाषण में लता हया की एक सुंदर नज़्म प्रस्तुत कर हिंदी और उर्दू के गहरे संबंधों को उजागर किया।
'तुग़लक़' गिरीश कर्नाड द्वारा रचित एक ऐतिहासिक नाटक है, जो 14वीं शताब्दी के शासक मुहम्मद बिन तुग़लक़ के जीवन और शासन पर आधारित है। तुग़लक़ को एक ऐसा शासक दिखाया गया है जो बुद्धिमान, दूरदर्शी और समानता की भावना से प्रेरित है। उसने समाज में सुधार लाने के लिए कई क्रांतिकारी कदम उठाए—जैसे राजधानी को दिल्ली से दौलताबाद स्थानांतरित करना और तांबे के सिक्कों को चलन में लाना।हिन्दू मुस्लिम तहज़ीबों को एक करने की मुसलसल कोशिश करना।
हालांकि, उसकी योजनाएं व्यवहारिक धरातल पर कमजोर साबित होती हैं। उसका अत्यधिक आदर्शवाद कई बार सनक की सीमा तक पहुँच जाता है, जिससे जनता में असंतोष बढ़ता है। अंततः वह अकेलापन, आत्म-संशय और विफलता से ग्रसित हो जाता है।
यह नाटक न केवल एक ऐतिहासिक कथा है, बल्कि यह समानता, सुधार और आदर्श तथा यथार्थ के संतुलन का संदेश भी देता है। तुग़लक़ का पात्र यह दर्शाता है कि अच्छी नीयत के साथ किए गए निर्णय,आपके निजी जीवन में भी, यदि ज़मीनी सच्चाई से कटे हों, तो वे विफल हो सकते हैं। नाटक मानव स्वभाव, नीति व सामाजिक जटिलताओं को गहराई से प्रस्तुत करता है।
इस नाटक के मंचन ने दर्शकों को गहरी वैचारिक यात्रा पर ले जाते हुए ऐतिहासिक किरदार मुहम्मद बिन तुग़लक़ के जीवन की जटिलताओं, आदर्शवाद एवं उसकी विफलताओं को बड़े प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। मंचन के दौरान बरनी और तुग़लक़ की 'रूहों' की नेपथ्य से संवाद शैली ने दर्शकों की सोच को झकझोरा।
हॉल हाउसफुल रहा। दर्शक कुर्सियों के अतिरिक्त ज़मीन और सीढ़ियों पर भी बैठकर प्रस्तुति का आनंद लेते देखे गए। दर्शकों की तालियों और मौन स्तब्धता ने यह सिद्ध कर दिया कि यह प्रस्तुति दर्शकों के दिलों को छू गई।
मुख्य पात्रों में:
नवनीत मिश्रा – तुग़लक़ की रूह
अजहर जमाल – बरनी की रूह
नरेंद्र नाथ पाठक – तुग़लक़
अभिषेक शर्मा – बरनी
सौम्या अदित्री – सौतेली मां
सिद्धार्थ मौर्या, अश्विन कृष्णा गौड़, राहुल मिश्रा, संदीप यादव, सुधाकर दूबे, संजय अरोड़ा समेत सभी कलाकारों ने बेजोड़ अभिनय कर दर्शकों को रोमांचित किया।
तकनीकी पक्ष और रचनात्मक सहयोग:
मंच संचालन: डॉ. सीमा मोदी
प्रकाश व्यवस्था: देवाशीष मिश्रा
मंच निर्माण: मोहम्मद शकील
कास्टयूम एवं प्रापर्टी व्यवस्था : मो शकील
वेशभूषा: शिव प्रशांत अवस्थी, योगेंद्र पाल, विनायक तिवारी
रूप सज्जा: शहीर अहमद, सचिन
लाइव सूफ़ीयाना संगीत: जिलानी, मोहम्मद सलीम
संगीत संयोजन: शुभम् दुबे
फोटोग्राफी/वीडियोग्राफी: आशुतोष विश्वकर्मा, शिवम सिंह
पूर्वाभ्यास व्यवस्था -अभिषेक शर्मा , अज़हर जमाल ,श्रवण यादव , शादाब अहमद,
पूर्वाभ्यास सहयोगी - नूर मोहम्मद ,रोहित ,कृष्णा ,सावित्री ,मालती आतिफ ,वसीम , आमिर
कार्यशाला सहयोगी...नवनीत मिश्रा
आभार..अखिल तिवारी, बिमला बरनवाल, श्रवण यादव, संतसेवक, वामिक ख़ान , अभिजीत सिंह, शीला बरनवाल
त्रैमासिक प्रशिक्षण के अंतर्गत तैयार की गई इस नाट्य प्रस्तुति ने स्पष्ट कर दिया कि जब परिकल्पना, निर्देशन और अभिनय का त्रिकोण सधा हुआ हो, तो कला जनमानस को गहराई से छूने में सक्षम होती है। विशेष उल्लेख उन कलाकारों का जो इस प्रशिक्षण में नवोदित रहे, पर उनके प्रदर्शन में कहीं भी नवाचार या अनुभव की कमी नहीं दृष्टिगत हुई।
निर्देशिका चित्रा मोहन और सह निर्देशक डॉ. सीमा मोदी की यह प्रस्तुति बौद्धिक, सांस्कृतिक और कलात्मक दृष्टि से एक ऐतिहासिक आयोजन सिद्ध हुई। अंत में कार्यक्रम के सभी कलाकारों व सहयोगियों को उर्दू अकादमी की ओर से सम्मानित किया गया।

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