मनोज मौर्य की कलम से .......
लखनऊ l आज हम आपके समक्ष एक ऐसी सच्ची कहानी लेकर आए हैं, जो सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन हजारों-लाखों मेहनतकशों की है जो सच्चे मन से काम करते हैं, लेकिन कभी अपने हक का सम्मान नहीं पा पाते।
यह कहानी है रामचंद्र जी की — जिन्हें नगर निगम केंद्रीय कार्यशाला, आर-आर विभाग में सभी प्यार से "काका" और हम सब "चाचाश्री" के नाम से जानते हैं। आज से करीब 25 वर्ष पहले, रामचंद्र जी ने मिस्त्री के रूप में काम करना शुरू किया था। तब से लेकर आज तक, उन्होंने नगर निगम की न जाने कितनी हाइड्रॉलिक गाड़ियों, ट्रकों और अन्य मशीनों को अपने हुनर और ईमानदारी से दुरुस्त किया है।
काबिलियत जो कभी दस्तावेजों में नहीं उतरी
रामचंद्र जी ने कभी कोई बड़ा स्कूल-कॉलेज नहीं देखा, लेकिन मशीनों की हर एक पुर्ज़ी से उन्हें वैसी ही पहचान है जैसी किसी इंजीनियर को होती है। उनके हाथों से बनी गाड़ियाँ न सिर्फ सड़कों पर बेहतर तरीके से चलीं, बल्कि उन्होंने नगर निगम को लाखों रुपये की बचत भी करवाई।
उनका अनुभव किसी डिग्री से कम नहीं। लेकिन आज भी, अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि वह "क्लीनर" के पद पर कार्यरत हैं। जहां एक ओर प्राइवेट सेक्टर में अनुभव के आधार पर सम्मान, पद और वेतन दिया जाता है, वहीं रामचंद्र जी जैसे कर्मठ और ईमानदार व्यक्ति को शासन-प्रशासन द्वारा आज तक सिर्फ नजरअंदाज किया गया।
कई आए और चले गए... पर काका वहीं के वहीं
इन 25 वर्षों में न जाने कितने नगर आयुक्त, महापौर, और चीफ इंजीनियर आए और चले गए, लेकिन किसी ने भी यह नहीं देखा कि एक व्यक्ति मिस्त्री का कार्य करते हुए क्यों "क्लीनर" के पद पर अटका हुआ है? क्या सिर्फ इसलिए कि उसके पास डिग्री नहीं है? क्या मेहनत, अनुभव और निष्ठा का कोई मूल्य नहीं?
आज काका उन्हीं अधिकारियों के नीचे काम कर रहे हैं जिन्हें मशीनों का नाम तक नहीं मालूम। लेकिन फाइलों में वे पद पर हैं, और रामचंद्र जी बस एक नाम।
अब समय है बदलाव का
नगर निगम और शासन-प्रशासन को इस सच्चाई की ओर देखना होगा। जब एक कर्मयोगी अपने अनुभव से संस्थान को बेहतर बना सकता है, तो क्यों न उसे उसका हक मिले?
रामचंद्र जी जैसे सच्चे लोगों को आगे लाकर ही हम एक न्यायसंगत और कार्यकुशल व्यवस्था बना सकते हैं। उन्हें मिस्त्री का पद और सम्मान देना केवल उनके लिए नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के लिए जरूरी है।
समाप्ति नहीं, एक नई शुरुआत
रामचंद्र जी की कहानी कोई एक अंत नहीं, बल्कि हजारों सच्चे लोगों की आवाज़ है जो इंतजार कर रहे हैं कि कोई उनकी मेहनत को पहचाने।
हम, राष्ट्र की बात में, आपके लिए ऐसी ही सच्ची और प्रेरणादायक कहानियां लाते रहेंगे। क्योंकि सच्चे नायक हमेशा मंच पर नहीं होते, कुछ लोग कार्यशालाओं में पसीना बहा रहे होते हैं – पूरी ईमानदारी से।
– एक सच्चे कर्मयोगी को समर्पित


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