मंजुल भारद्वाज
वस्तुस्थिति बदलने वालो
हमेशा उस मंजर से बचो जहां
बीच समंदर में लहर प्यासी हो
सपनों को हासिल करने वालो
हमेशा उस धरातल से बचो जहां
आरजू ख़ुशी का सबब बनने की बजाए
दर्द की , गम की अमानत बन जाए
नयी खोज,नए आविष्कार करने वालो
हमेशा उस मृगतृष्णा से बचो जहां
अपनी परछाई आपको छले
शोध एक हासिल होने की बजाए
एक अंतहीन भटकाव बन जाए
वीरानो को आबाद करने वालो
हमेशा अतिविश्वास के दम्भ से बचो जहां
हौंसलों का आधार सिर्फ निरी भावनाएं हों
और
विचार हवा में सूखे पत्तों की तरह उड़ रहे हों
साधना के साध्य के साधको
हमेशा उस मन;स्थिति से बचो जहां
एकांतवास को तन्हाई आ घेरे
सृजन को दुनियावी व्यवहार ढक ले
हे बेहतर और मानवीय विश्व के रचनाकारो
उपरोक्त सृजन के ‘भंवरों’ से उभरने के लिए
हमेशा इस ‘पल’ और ‘गति’ की दिशा
की नजब को पकड़े रहो
इस ‘पल’ और ‘गति’ के स्पंदन से
स्पन्दित होकर ‘चैतन्य के चिंतन’ प्रकोष्ठ में
व्यवहार मुक्त, मानवीय ‘तत्व और सत्व’
को सृजते रहो
फिर देखो व्यवहार और प्रमाण
पतवार बनकर कैसे आपके जीवन की
नैया पार लगाते हैं और आप इस संसार के
दीप स्तम्भ बनकर सदियों तक
सभ्यताओं के पथ प्रदर्शक के रूप में जिंदा रहेगें
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