“परिवारवाद की बढ़ती पकड़ से युवाओं में राजनीति को लेकर नकारात्मक सोच — जमीनी नेताओं के लिए अवसर सीमित” — जितेंद्र कुशवाहा
बिहार की राजनीति में परिवारवाद एक बार फिर प्रमुख रूप से उभरकर सामने आया है, और इस प्रवृत्ति ने राज्य के युवाओं में राजनीति के प्रति नकारात्मक सोच को जन्म दिया है। समाजसेवी जितेंद्र कुशवाहा का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीति का आधार योग्यता, ईमानदारी और जनता से जुड़ी प्रतिबद्धता होनी चाहिए, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत दिखती है। कई राजनीतिक दल टिकट वितरण में परिवारिक वंश और रिश्तों को प्राथमिकता देकर ऐसे संकेत दे रहे हैं कि राजनीति में प्रवेश और अवसर योग्यता से नहीं बल्कि वंश से तय होते हैं।
जितेंद्र कुशवाहा ने कहा कि यह स्थिति न केवल युवाओं का मनोबल गिरा रही है, बल्कि जमीनी स्तर से कार्य करने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं के लिए रास्ते भी संकुचित कर रही है। बिहार जैसे राज्य में जहां विकास, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, वहां परिवारवाद के कारण नई सोच और नए नेतृत्व के उभरने की संभावना कम हो जाती है।
उन्होंने कहा कि यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर कर रही है और राजनीति को एक बंद संरचना का रूप दे रही है। इससे युवा राजनीति से दूर हो रहे हैं और वे मानने लगे हैं कि राजनीतिक क्षेत्र कुछ परिवारों की जागीर बनकर रह गया है। यह स्थिति न केवल वर्तमान राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करती है बल्कि आने वाले समय में राज्य के भविष्य के लिए भी चुनौती है।
अंत में, जितेंद्र कुशवाहा का स्पष्ट मत है कि जनता को ऐसे नेताओं को आगे लाना चाहिए जो जमीनी स्तर पर जुड़े हों, मेहनत करते हों और समाज की वास्तविक समस्याओं के प्रति गंभीर हों। यदि बिहार को एक पारदर्शी, सक्षम और न्यायपूर्ण राजनीतिक भविष्य की ओर बढ़ाना है, तो परिवारवाद की जकड़न को तोड़ना अत्यंत आवश्यक है। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब अवसर परिवारिक पहचान से नहीं बल्कि योग्यता और जनसेवा की भावना से तय होंगे।

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