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पंछियों का संकल्प !

मंजुल भारद्वाज 

दो पंछियों को भूख लगी थी । वो उड़ते उड़ते एक पेड़ पर जा बैठे । पेड़ फलों से लदा हुआ था । उसके फलों की खुश्बू हवा को महका रही थी । पंछियों ने एक दूसरे से कहा, वाह क्या खुशबू है, आज इन्हीं फलों को चखते हैं। अरे मज़ा आ गया । मैंने तो पेट भरकर फ़ल खाए। दूसरे पंछी ने कहा मैंने भी । 


दोनों पंछी थोड़ा उदास हो गए । एक बोला , अरे यह पेड़ हमारे घोंसले से बहुत दूर है। दूसरे पंछी ने कहा , हम्मम!


दोनों ने एक युक्ति निकाली। हम अपनी चोंच में इन फलों के बीज ले चलते हैं और उनको अपने घोंसले के आस पास जो खाली जगह हैं उसमें डाल देंगे। ठीक है दोनों ने प्रसन्नता पूर्वक एक दूसरे को प्यार करते हुए कहा।


दोनों पंछियों ने अपने बच्चों को भी यह बात सिखाई । पंछियों ने दूर दूर उड़ान भर कर अच्छे , मीठे, फलों के बीजों को अपने घोंसलों के आसपास गिरा दिया ।


धीरे धीरे वहां समय बीतता गया और मीठे हवादार और छायादार पेड़ों का जंगल उग आया । इन पेड़ों पर हज़ारों पंछी चहचहाते हुए रहते थे । पास से एक नदी भी बहती थी ।


धीरे धीरे इंसान भी इस जंगल में आने लगे । नदी में स्नान करते और पेड़ों की छाया में आराम कर फ़ल भी खाते । पंछी, पेड़, जंगल में रहने वाले प्राणी और मनुष्य ,सब एक साथ रहते हुए , प्रकृति का सहअस्तित्व बनाए हुए थे ।


एक बार नदी में बहुत सारे लोग स्नान करने आए । उस भीड़ में से एक विशेष समूह इन फलदार पेड़ों की घनी छाया में आकर बैठ गया । इस समूह के एक सदस्य ने कहा, वाह क्या जगह है! इस पर तो बड़ा रिसोर्ट बनाया जाए । क्या जगह है। पास में नदी । बहुत मुनाफा होगा। दूसरे ने कहा बना तो लोगे , पर यह जगह कौन देगा तुम्हें?  तीसरे ने कहा हम मंत्री किसलिए हैं ! यह जगह सरकारी है। और सरकार पैसे वालों की नौकर है। देखो हमारे बड़े नेता भी एक पैसे वाले के नौकर हैं। अदालत हमारी,पुलिस हमारी । हमारी नीति है हमें चंदा यानी घूस दो , हम तुम्हें मुनाफा!


दूसरे ने नेता की बात काटते हुए कहा , और जनता ?


नेता ने कहा अरे जनता धर्म की , भगवान की ।


भाषण के अंदाज़ में नेता : अरे जनता मूर्ख है। देखो हमने सारी नौकरियां खा ली । फ़िर भी जनता हमको वोट दे रही है ना । नौकरी खाकर में जनता को सम्मान निधि से सम्मानित करते हैं। खटाखट पैसा, फ़टाफ़ट वोट ।


नेता का चमचा जोर से बोला , हां हां आप तो लगातार तीन बार बहुमत से सरकार में हैं। 


नेता : कैसे ? 


चमचा :धर्म की जय हो , भगवान का मंदिर और वोट के बदले नोट से ! 


बिलकुल सही । चमचे को शाबाशी देते हुए नेता ने कहा,अगली बार तुम्हारा मंत्री बनना तय है।


रिजॉर्ट का ख्वाब देखने वाला बोला पर यह ज़मीन हम को कैसे दोगे । नेता मुस्कुराते हुए , अरे तुम उतावले और चिंतित हो जाते हो ! अभी एक बड़ा धार्मिक स्नान है। उसमें जनता आयेगी, साधु संन्यासी आयेंगे, वो कहां ठहरेंगे! आखिर धर्म की रक्षक सरकार है हमारी, तो साधु , संतो को यहीं तुम्हारे रिसॉर्ट में रुकवा देंगे।


अरे वाह नेता जी, धर्म रक्षक सरकार की जय हो ! नेता और उसके लोग वहां से चले जाते हैं।


पंछी जो नेता के लोगों की बात सुन रहे थे घबरा गए । अचानक सारे पंछी चहचहाने लगे । हमारे घोंसले तोड़ दिए जायेंगे। हम कहां जायेंगे। जंगल के सभी प्राणी इकठ्ठा हो गए । सभा बुलाई। सभा में हर किसी ने अपने मन की बात रखी ।


मनुष्य प्रकृति को क्यों उजाड़ता है ? प्रकृति तो उसे उसके जीने के लिए सब देती है।


क्या मनुष्य को शुद्ध हवा,हरा भरा परिसर नहीं चाहिए।


यह पेड़ हैं तो जंगल हैं, जंगल हैं तो पानी है, पानी है तो जीवन है।


एक पंछी ने गुस्से में कहा, मनुष्य को सिर्फ़ धर्म चाहिए। मनुष्य पापी है वो धर्म के नाम पर गंदे नाले में स्नान कर पाप धोता है।


दूसरे पंछी ने कहा, हां हां आस्था मनुष्य की बुद्धि को खत्म कर देती है। आस्थावान लोग अन्न नहीं गोबर खाते हैं और मूत्र पीते हैं। 


अरे मनुष्यों की बात बहुत हो गई । अब अपने आशियाने को बचाने की बात करोगे की नहीं , एक उम्रदराज पंछी ने लगभग डांटते हुए कहा ।


सभा खामोश हो गई । थोड़ी देर बाद एक छोटा पंछी बोला , क्यों ना हम नया आशियाना बसाएं!


पर हम अपनी वर्षों पुरानी जगह क्यों छोड़ें? हम मनुष्यों को अपना जंगल नहीं देंगे ! सभा ने एक ज़ोरदार स्वर में प्रस्ताव पास किया !

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