मंजुल भारद्वाज
एक बार एक बहुत बड़े नेता थे । जिन्होंने साम को छोड़ दाम,दंड और भेद से लोकतंत्र को तबाह करते हुए सत्ता पर अपनी अभेद्य पकड़ बना ली थी ।
उनकी एक दस साल की बेटी थी जिसको उन्होंने दुनिया की हर वस्तु खरीद कर दी थी । नौकर चाकर , टीवी, कंप्यूटर, महंगे खिलौनों से महलनुमा घर भरा हुआ था । नेता जी अपनी बेटी को बहुत प्यार करते थे ।
बेटी टीवी देख देख कर बोर हो गई । पापा यानी नेता जी से बोली , पापा टीवी बकवास हो गया है। सब जगह लड़ाई , मारा,मारी खून खराबा है।
पापा : अरे बेटी बच्चों के चैनल देखो । बेटी ने तपाक से कहा , पापा मैं उन्हीं चैनलों की बात कर रही हूं । कहीं भी पेड़,जंगल, हवा की बात नहीं होती । सब जगह मारा मारी !
नेता ने बेटी को पुचकारते हुए पूछा , तो क्या बुद्ध बनोगी!
बेटी ने कहा , बुद्ध मतलब ? नेता ने बुद्ध की पूरी कथा बेटी को सुनाई । बेटी ने कहा , पापा मुझे ऐसा पेड़ दिखाओ जिसके नीचे बैठकर बुद्ध जैसे तपस्या की जा सके ।
बस इतनी सी बात है। नेता ने पुत्री को आश्वस्त करते हुए कहा । एक पेड़ ! अरे बेटी हज़ारों पेड़ हाज़िर हैं आपके लिए। अपने नौकरों को हिदायत दी बेबी को अच्छे गार्डन में सैर कराओ!
सप्ताह भर के दौरे पर नेता जी चले गए । नौकर बेटी को घुमाने लगे गार्डन - गार्डन।
सप्ताह भर नेता जी लौटे। उन्होंने उत्साह पूर्वक बेटी से पूछा क्यों कितने पेड़ मिले ? बेटी ने निराश होकर उत्तर दिया , एक भी नहीं !
तो क्या किसी ने तुम्हें गार्डन नहीं घुमाया ? घुमाया पापा,पर वहां सारे पेड़ रो रहे थे । उनको शहर के प्रदूषण ने ढक लिया है। नेता ने फुर्ती में बात बदलते हुए कहा,अरे बेटी थोड़ा दूर के गार्डन में चलेंगे।
अपने नौकरों को बेटी को दूर के गार्डन में घुमाने का आदेश देते हुए नेता जी सप्ताह भर के दौरे पर फ़िर निकल गए।
दौरे से लौट कर नेता जी ने पूछा, कितने पेड़ मिले? बेटी ने उदास होते हुए कहा , एक भी नहीं ! क्यों अबकी बार क्या हुआ ? पापा कोई पेड़ कुपोषित है, कोई पेड़ उस मिट्टी का नहीं , जैसे नारियल के पेड़ को रेगिस्तान में लगा दिया हो । और बेर के पेड़ को घनी बरसात वाली जगह । सब नकली - नकली लगा मुझे।
नेता जी वर्ष भर लगे रहे,नौकर बेटी को घुमाते रहे पर बेटी को बुद्ध वाला पेड़ नहीं मिला। कहीं पेड़ के इर्द गिर्द टोने टोटके ,कहीं थूक खखार से सने हुए, कहीं भी वो पेड़ नहीं मिला जो बेटी को चाहिए!
नेता जी ने कहा,कोई बात नहीं बेटी हम तुम्हें जंगलों में लिए चलते हैं।
नेता जी बेटी को सचमुच जंगल में ले गए । सीना तानकर बेटी को बोले , चुन लो बेटी कौन सा पेड़ चाहिए। थोड़ी देर में जंगल में धाय - धाय गोलियां की आवाज़ आने लगी ।
नेता के सचिव ने बताया सर आपने यह जंगल पूंजीपति को बेच दिया है। पुलिस आदिवासियों से जंगल खाली करवा रही है। आदिवासी विरोध कर रहे हैं।
बेटी ने कहा ,पापा यहां भी खून खराबा !
पापा आपने बुद्ध वाला पेड़ देने का वादा किया है! बेटी बोलती रही...
नेता के मस्तिष्क में हर वो मंज़र घूमता रहा कि उसने कहां,कहां के जंगलों को बेचा । पेड़ कटवा दिए। जनता को खरीद लिया। सत्ता पर सर्वशक्ति मान हो बैठ गए । पर बेटी को एक पेड़ नहीं दे पाए !
वो बुद्ध वाला पेड़,जहां साधना के बाद दुनिया को अहिंसा,प्रेम और मुक्ति का ज्ञान मिला था !
बेटी जिद्द पर अड़ी थी,सर्वशक्तिमान नेता असहाय था, वो अपनी बेटी को बुद्ध वाला पेड़ नहीं दे पाया ... सिर्फ़ एक पेड़ !

बहुत ही अच्छा लेख आज के परिवेश में पर आधारित है
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