मंजुल भारद्वाज
दुनिया के प्रथम पुरुष को एडम और स्त्री को इव माना जाता है। दुनिया के प्रथम पुरुष और स्त्री ने अपने प्रेम से यह दुनिया रची । खूबसूरत अविरल प्रेम की खूबसूरत दुनिया!
उनकी संतानों के उनके ख़्वाब को बदल डाला। एडम और इव की संतानों ने स्त्री के लिए अलग और पुरुष के लिए अलग नियम बना डाले ।
स्त्री को दीवारों में सुरक्षित पाया गया और पुरुष के लिए दीवारें असुरक्षित मानी गईं! दरअसल समता को सहेजने की बजाए श्रेष्ठता का संघर्ष हो गया । पुरुष ने अपने वर्चस्व के लिए स्त्री को अपनी जागीर बना लिया।
पुरुष की सत्ता को वैध ठहराने के लिए धर्म का आधार लिया गया। संपति की संकल्पना ने पितृसता की सामाजिक,सांस्कृतिक संरचना का निर्माण किया। मक़सद एक स्त्री को दीवारों के बीच क़ैद करके रखना ।
स्त्रियों ने संघर्ष किया और दीवारों को तोड़ा... लगातार तोड़ रहीं हैं.. चाहे वो धर्म की दीवार हो, पितृसत्ता की दीवार हो या आज बाजारवाद की दीवार हो ... वो लगातार अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष कर रही हैं... अपनी दीवारों से ....
पर पुरुष कल भी अपनी अदृश्य दीवारों में क़ैद था और आज भी क़ैद है...
पुरुष को अपनी दीवारें दिखाई नहीं देती .. जब दिखाई नहीं देती तो तोड़ेंगे कैसे ?
पुरुष की पहली दीवार है कि वो श्रेष्ठ है। इस श्रेष्ठता के विकार ने उसे हिंसक,व्यभिचारी,नृशंस और वीभत्स बना दिया । उसने अपनी सत्ता को श्रेष्ठता के इर्द गिर्द बुना और हमेशा हमेशा के लिए उसमें क़ैद हो गया। सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि इस क़ैद को वो अपनी मुक्ति समझता है।
श्रेष्ठता बोध वो आत्महीनता है जिससे पुरुष आज तक बाहर नहीं निकल पाया अपितु उसके बनाए धर्म और सत्ता बार बार उसे इस अंधी गुफ़ा में धकेलती रहती हैं। चाहे वो अवतार पुरुष राम हों, महाज्ञानी रावण हो या धोबी !
परिणाम है अपनी अदृश्य दीवारों में क़ैद पुरुष ने जीवन और दुनिया को हिंसा,युद्ध,रक्तपात,बलात्कार से नरक बना रखा है। जीवन और दुनिया को जहन्नुम बनाए रखने के लिए उसने वैज्ञानिक शोध से ईजाद तकनीक को पर्यावरण और पृथ्वी के विध्वंस का हथियार बनाया हुआ है।
दुनिया को शांति,समता,विविधता से खूबसूरत बनाना है तो पुरुष को अपनी अदृश्य दीवारों को तोड़ना अनिवार्य है!
उससे पहले यह अनिवार्य है की पुरुष यह स्वीकारें कि वो हिंसा,आत्महीनता और श्रेष्ठता की "अपनी अदृश्य दीवारों " में क़ैद है जो उसे वीभत्स,बर्बर हत्यारा और बलात्कारी बनाती हैं!
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