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दर्शक की आंखों में भ्रम नहीं

थियेटर ऑफ़ रेलेवंस की कलात्मक साधना !

मंजुल भारद्वाज 

थियेटर ऑफ़ रेलेवंस 
नाटक नहीं दर्शकों के सामने 
काल को रख 
समय को खोल देते हैं!

तब संगम होता है 
काल,चेतना,सौंदर्यबोध का
जो मथता है जड़ता को
आकार देता है काल को
रचता है चैतन्य पूर्ण समय
जिस पर लिखा होता है 
कलात्मक परिवर्तन !

काल तारीखों में नहीं बदलता
वो दर्शकों के भीतर बदलता है 
बिना चकाचौंध के 
लाग लपेट के 
दर्शक और कलाकार 
दोनों एक कालखंड को जीते हैं 
आंखों से होते हुए
मंच पर नहीं दर्शकों के
मस्तिष्क पर मंचित होता है 
थियेटर ऑफ़ रेलेवंस का नाटक !

नाटक का एक एक दृश्य
धूप छांव सा अपनी छाप
छोड़ते हुए एक चेतनात्मक लौ से
जगमगाता है दर्शक का चैतन्य
जो भाव को साधते हुए 
नाउम्मीद में उम्मीद का दीया जलाता है।

दर्शक उस दिये की रोशनी में 
चलता है जड़ता को तोड़ते हुए
यही कला का विद्रोह है 
जो सृजित करता है नया काल 
बिना हिंसा ,अराजकता के 
व्यवस्था को बदलते हुए!

थियेटर ऑफ़ रेलेवंस का लेखन ढर्रे का 
लेखन नहीं होता
यहां लेखक असमंजस के
झूले में नहीं झूलता
हर सिरे पर बैठी कहानी को
अधूरा नहीं छोड़ता
अपितु उसे दूसरे छोर से
जोड़ देता है जहां से
दर्शक अपना सिरा पकड़ लेता है!

लेखक हर किरदार को 
शोध के लिए काल की 
परिधि तक खुला छोड़ता
फ़िर हर किरदार ध्येय की
यात्रा में आ जुड़ता है 
अंत नहीं 
अपितु नव सृजन के लिए 
इस कलात्मक जुनून और 
दीवानगी को भाव ऊर्जा देते हैं 
और 
चैतन्य से आलोकित दृष्टि दिशा !

इसी दृष्टि का संचार - संप्रेषण करते है थियेटर ऑफ़ रेलेवंस के कलाकार 
सचेत,योजनाबद्ध ,सहज
दर्शकों में रंग चेतना जगाते हुए!

थियेटर ऑफ़ रेलेवंस के कलाकार कोई प्रोजेक्ट नहीं करते
सतत सच्ची रंग साधना करते हैं 
काल को साधते हुए!

दर्शक संवाद से तोड़ते हैं 
दर्शक की एक एक भ्रांति
हर संवाद में दर्शक के मन में 
व्यवस्था निर्मित एक एक भ्रांति
गिरकर टूट जाती है 
लोग कहते हैं समय बदल देता है 
थियेटर ऑफ़ रेलेवंस के कलाकार समय बदल रहे हैं 
वो भ्रांति में जीने वालों को
सत्य का दर्शन करा 
वास्तविकता को बदल देते हैं!

दर्शक की आंखों में भ्रम नहीं
सत्य जगमगाता है 
और सत्य की लौ उसे
बदलाव की निर्णायक कड़ी बना देती है 
दर्शक के मस्तिष्क व्यवस्था का
भूगोल बदलने लगता है 
हर पहलू सत्य की लौ में 
अपनी नई व्याख्या करता है 
प्रेम,साहस और समग्रता के साथ 

यह यकायक,अचानक, अनायास नहीं 
सुक्ष्म अनुभूतियों की बूंद बूंद से बहती सृजन धारा है 
जो अपने बहाव में दर्शकों को 
विवेक और मर्म से भिगो देती है 
नाटक एक प्रस्तुति नहीं
जीवन अनुभूति हो जाती है 
जहां चैतन्य,सौंदर्यबोध और काल एक साथ जीता है 
नए काल को सृजित करते हुए!

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