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नगर निगम की समीक्षा बैठक में सफाई, पार्क और स्ट्रीट लाइट गायब, सीवर–जलकल तक सीमित रही चर्चा

मूलभूत सुविधाएं हाशिये पर, नगर निगम की बैठक में केवल सीवर और जलकल पर मंथन


जनता की जरूरतें अनसुनी: नगर निगम समीक्षा बैठक में बुनियादी समस्याओं पर चुप्पी


मनोज कुमार मौर्य  

लखनऊ l  नगर निगम की समीक्षा बैठक में मूलभूत समस्याएं हाशिये पर, सीवर–जलकल तक सिमटी चर्चा

नगर निगम मुख्यालय में आयोजित विस्तृत समीक्षा बैठक में शहर की बुनियादी समस्याओं के समाधान की उम्मीद लगाए बैठे जनमानस को एक बार फिर निराशा हाथ लगी। बैठक में सीवर, जल निगम और जलकल से जुड़े विषयों पर तो लंबी चर्चा और तकनीकी मंथन हुआ, लेकिन नगर की अन्य आवश्यक व्यवस्थाएं पूरी तरह चर्चा से बाहर रहीं। हैरानी की बात यह रही कि बैठक में मौजूद किसी भी पार्षद ने न तो शहर की बदहाल सफाई व्यवस्था का मुद्दा उठाया और न ही डोर-टू-डोर कूड़ा उठान की अनियमितताओं पर सवाल खड़े किए। जगह-जगह लगे कूड़े के ढेर, समय से कचरा न उठने और स्वच्छता कर्मियों की कमी जैसी समस्याएं एजेंडे से गायब रहीं।

इसी तरह नगर के उद्यानों की दुर्दशा पर भी चुप्पी साध ली गई। हरियाली के नाम पर बदहाल पार्क, टूटे झूले, सूखी घास और रखरखाव के अभाव में दम तोड़ते सार्वजनिक उद्यानों की स्थिति पर किसी जनप्रतिनिधि ने आवाज़ उठाना जरूरी नहीं समझा। मार्ग प्रकाश व्यवस्था भी बैठक में उपेक्षित रही, जबकि कई वार्डों में स्ट्रीट लाइटें महीनों से खराब पड़ी हैं, जिससे रात के समय नागरिकों को भारी परेशानी और असुरक्षा का सामना करना पड़ रहा है।

बैठक में महापौर, नगर आयुक्त और निगम के वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी के बावजूद झाड़ू, पार्क और स्ट्रीट लाइट जैसे सीधे जनता से जुड़े मुद्दों को एजेंडे में शामिल नहीं किया जाना कई सवाल खड़े करता है। ऐसा प्रतीत हुआ मानो सभी वार्डों में केवल सीवर और जलकल की ही समस्याएं शेष रह गई हों और बाकी बुनियादी सुविधाएं स्वतः ही दुरुस्त हों।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि निगम की बैठकों में बार-बार उन्हीं चुनिंदा विषयों पर चर्चा कर वास्तविक जमीनी समस्याओं को टाला जा रहा है। सफाई, हरियाली और प्रकाश जैसी सुविधाएं ही किसी शहर की पहचान होती हैं, लेकिन इन्हें “अगली बैठक” के भरोसे छोड़ दिया जाना जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताओं पर सवालिया निशान लगाता है। अब देखने वाली बात यह होगी कि आने वाली बैठकों में नगर निगम शहर की इन अनदेखी समस्याओं को गंभीरता से लेता है या फिर जनता की मूलभूत जरूरतें यूं ही फाइलों और बैठकों के बीच दबकर रह गया l

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