जाति सिर्फ जाति है। इसे समाज कहकर धोखा न दें। जाति के हक-अधिकार की लड़ाई कभी समाज की लड़ाई नहीं हो सकती। समाज की असली लड़ाई तो मनुष्य के हक-अधिकार की लड़ाई है; वह लड़ाई जो ऊँच-नीच, अमीरी-गरीबी, समृद्धि और अभाव के बीच चल रही है।
मनुष्य को बाँटने वाली जाति तो हमेशा से मानवता की सबसे बड़ी दुश्मन रहीं है, कुछ लोग जाति की आग जलाकर अपना चेहरा चमकाने का खेल खेलते हैं। वे अपने माथे पर जाति का ब्रांड चिपकाकर समाज को जाति-जाति में बाँट देते हैं। ये लोग मानव समाज के सबसे बड़े दुश्मन हैं। जानबूझकर वे जातीय व्यवस्था को और मजबूत करते हैं, ताकि पूरा समाज हमेशा वर्ण व्यवस्था के जाल में फँसा रहे और कभी एक न हो सके।
जो लोग जाति की लड़ाई लड़कर उसे वंचित समाज की लड़ाई बता रहे हैं, उनसे पूरी तरह सावधान रहने की आवश्यकता है। वे पहले जाति को समाज कहकर भ्रम फैलाते हैं, फिर अपना व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्ध करते हैं और चेहरा चमकाने के अलावा कुछ नहीं करते। जबकि सच यह है कि जाति की लड़ाई हमें बाँट रही है, जबकि समाज की लड़ाई हमें एक करने की कोशिश करती है।

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