Manoj Manav
एक तरफ करोड़ों-करोड़ों आम भारतीयों को नमक और प्याज चाटकर जीवन-यापन के लिए विवश करने और दूसरी ऒर अपने पूँजीपति मित्रों को सत्ता के संरक्षण में एक हज़ार करोड़ की ड्रेस पहनकर मेटगाला के रैम्प पर राष्ट्र-प्रचार करने की आजादी, यह कैसा राष्ट्रवाद और देशभक्ति है, एक ही देश में दो भारत कैसे, कृपया प्रधानमंत्री सभी भारतीयों को बतायें?
अभी प्रधानमंत्री मोदी ने जनता से अपील किया सोना मत खरीदो, पेट्रोल-डीज़ल कम जलाओ, खाने का तेल घटाओ, विदेश मत जाओ और यह त्याग करो। पहले यही त्याग पूँजीपति मित्रों से करनी चाहिए आखिर वे भी तो राष्ट्रभक्ति और देशभक्ति दिखाए, फिर किसी से उम्मीद करें।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 में समानता का अधिकार देता है, अनुच्छेद 38-39 में राज्य को आर्थिक-सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने और संपत्ति के उत्पादन व वितरण को आम जनहित में नियंत्रित करने का निर्देश देता है। फिर भी, जब सत्ता-समर्थित अरबपतियों का भव्य प्रदर्शन 'सॉफ्ट पावर' और 'देश का गौरव' बताकर वाहवाही की जाती है, उसी वक्त आम आदमी से त्याग की अपील की जाती है, तो क्या यह संवैधानिक नैतिकता का घोर मज़ाक नहीं है?
पहले इन 'मित्रों' से अपेक्षा की जाए कि वे अनुच्छेद 39(c) के अनुसार संपत्ति का वितरण कैसे सुनिश्चित कर रहे हैं, अपनी भव्यता पर अंकुश लगाएँ, फिर आम नागरिक से 'कम खरीदो-त्याग करो' का उपदेश दिया जाए। अन्यथा, यह 'कुछ लोगों के लिए मेटगाला और हीरे-जवाहरात, बाकियों के लिए नमक-प्याज और त्याग' देश में यह नया सामंती मॉडल नहीं चलेगा, जो संविधान की मूल भावना के प्रतिकूल है।

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