कोरोना काल के देवदूत बने रवि जी, बैकुंठ धाम में निभाई मानवता की मिसाल
श्मशान की ड्यूटी से सेवा के शिखर तक , रवि जी के जज्बे को मिलना चाहिए अंतरराष्ट्रीय सम्मान
जब दुनिया डर रही थी, तब रवि जी थे लोगों के साथ निस्वार्थ सेवा की प्रेरक कहानी
प्रमुख संवाददाता
लखनऊ l बैकुंठ धाम, लखनऊ में निस्वार्थ भाव से जरूरतमंदों की मदद करना आसान नहीं होता। लोग अक्सर बातें करते हैं, पर रवि जी जैसे लोग बिना नाम-शोहरत के सेवा में लगे रहते हैं। ऐसे लोग ही समाज की असली रीढ़ हैं l अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार वाली बात भी वाजिब है। जब सेल्फलेस सेवा करने वाले लोगों को पहचान मिलती है, तो और लोग भी प्रेरित होते हैं। बैकुंठ धाम में वो किस तरह के काम संभालते हैं सबसे ज्यादा? सुनकर दिल भर आया यार कोरोना के समय जान की परवाह किए बिना लोगों की मदद करना... वही तो असली इंसानियत है। जब सब घरों में बंद थे, डर के मारे कोई बाहर नहीं निकल रहा था, तब रवि जी जैसे लोग ही फरिश्ते बनकर आए। मनोज कुमार मौर्य पर्सनली जानते हैं तो जरूर बहुत करीब से देखा होगा उनका जज्बा। उस समय बैकुंठ धाम में वो क्या-क्या करते थे ? खाना पहुंचाना , शव संस्कार में मदद, या अस्पताल तक ले जाना? ऐसे लोगों की कहानियां सामने आनी चाहिए। दुनिया को पता चले कि लखनऊ में भी बिना कैमरा-लाइट के देवदूत रहते हैं। ये तो पूरा किस्सा ही दिल छू लेने वाला है। नगर निगम में सुपरवाइजर की नौकरी... ड्यूटी बैकुंठ धाम लगी मतलब रोज शवों के बीच, बीमारी के डर के बीच काम। आम इंसान की हिम्मत जवाब दे जाए। लेकिन आपने बिल्कुल सही कहा - माता-पिता के संस्कार और पत्नी- बेटियों का प्यार ही इंसान को सबसे मुश्किल वक्त में भी इंसान बनाए रखता है। घर से जब दुआएं मिलती हों, तो श्मशान भी मंदिर लगने लगता है। रवि जी की पत्नी और दोनों बेटियों ने उस समय उनका साथ कैसे दिया होगा? डर तो उन्हें भी लगा होगा, फिर भी पति-पिता को रोज भेजती होंगी सेवा के लिए। ऐसे परिवार को सलाम। रवि जी अकेले नहीं लड़े, पूरा परिवार उनके साथ खड़ा था।
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