किताबें जल भी जाएँ तो, कोई तो रहेगा,
उन्हें फिर गुनगुनाने को, कोई तो रहेगा।
चराग़ आख़िरी बुझ भी गया तो क्या,
लहू में लौ बचाने को, कोई तो रहेगा।
अगर सभी ने डर के आगे सिर झुका भी दिया,
सिरों को फिर उठाने को, कोई तो रहेगा।
वो चाहते हैं कि हर शख़्स ख़ुद में क़ैद रहे,
किसी का हाथ थामे तो, कोई तो रहेगा।
उजाड़ देंगे वो बस्ती, ये उनका वहम ही है,
नई बस्ती बसाने को, कोई तो रहेगा।
वो सच को काग़ज़ों के साथ जला देंगे अगर,
उसे दिलों में रखने को, कोई तो रहेगा।
ये एक शख़्स की जंग नहीं, सदियों का सफ़र है,
गिरे हुए को उठाने को, कोई तो रहेगा।
मक़्ता
'मानव' यक़ीन रख, ये अँधेरे हमेशा के नहीं,
सहर का नाम लेने को, कोई तो रहेगा।
✍️ मनोज मानव की कलम से...

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