साकेत संत मौर्य
धर्म, जाति, आरक्षण और राजनीतिक नफरत के शोर में कहीं आम आदमी के असली सवाल तो नहीं खो गए?
जब से होश संभाला है, तब से भारत की राजनीति को करीब से बदलते हुए देखा है। इंदिरा गांधी जी को प्रधानमंत्री के रूप में देखा, यह मेरी याददाश्त में है !उनके समय की राजनीतिक चर्चाएं सुनीं, फिर एक के बाद एक सरकारें आती-जाती देखीं। राजनीतिक दल बदले, नेता बदले, चुनावी मुद्दे बदले और सत्ता के समीकरण भी बदलते रहे।बाबरी मस्जिद/विवादित ढांचे के विध्वंस का दौर भी देखा। उस समय देश में धार्मिक कटुता किस तरह बढ़ी, यह भी देखा।मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद आरक्षण को लेकर देश में जिस तरह का आंदोलनऔरसामाजिक तनाव पैदा हुआ, वह भी देखा।
लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि उस समय की कटुता और आज की कटुता में एक बड़ा अंतर है।आज राजनीतिक विरोध धीरे-धीरे सामाजिक दुश्मनी में बदलता दिखाई दे रहा है।और यह किसी एक राजनीतिक दल की समस्या नहीं है।
मैं यह बात किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं लिख रहा हूं।आज तक मैंने किसी भी राजनीतिक दल की सदस्यता नहीं ली है।मेरी निष्ठा किसी पार्टी से नहीं, बल्कि देश, समाज और आम नागरिक से है।
इसीलिए सत्ता चाहे किसी की हो, सवाल पूछना जरूरी है।आरक्षण—सिर्फ नौकरी का सवाल नहींआज भारत में आरक्षण सबसे बड़े और संवेदनशील सामाजिक मुद्दों में से एक है।आरक्षण का विरोध करने वालों के अपने तर्क हैं। उनका कहना है कि अवसर योग्यता और आर्थिक स्थिति के आधार पर मिलने चाहिए और जाति आधारित व्यवस्था लंबे समय तक नहीं चलनी चाहिए।
वहीं आरक्षण के समर्थकों का तर्क है कि सदियों की सामाजिक और शैक्षणिक असमानता को केवल यह कहकर समाप्त नहीं किया जा सकता कि अब सब बराबर हैं।
दोनों पक्षों की बात सुनी जानी चाहिए।
लेकिन हमें मूल प्रश्न से भागना नहीं चाहिए—
क्या आज भी समाज में सामाजिक और शैक्षणिक असमानता मौजूद है?
अगर है, तो उसे समाप्त करने की ठोस व्यवस्था क्या है?
और क्या ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है जिसमें हर बच्चे को बचपन से ही समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और अवसर मिले, ताकि भविष्य में आरक्षण की आवश्यकता धीरे-धीरे कम होती जाए?
दूसरी तरफ सामान्य वर्ग के गरीब बच्चे की परेशानी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इसलिए समाधान किसी जाति को दूसरी जाति के खिलाफ खड़ा करना नहीं है।
समाधान अवसरों को बढ़ाना है।
अगर देश में पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण सरकारी स्कूल, अच्छे कॉलेज, पर्याप्त रोजगार और समान अवसर होंगे, तो आरक्षण को लेकर होने वाली प्रतिस्पर्धा और कटुता भी कम होगी।
लेकिन असली सवाल—हमारे पास पर्याप्त अवसर क्यों नहीं हैं?
करोड़ों युवा नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
किसी को प्रतियोगी परीक्षा की चिंता है, किसी को भर्ती की, किसी को पेपर लीक की, किसी को नियुक्ति की प्रतीक्षा है।
दूसरी तरफ समाज को कभी धर्म के नाम पर, कभी जाति के नाम पर और कभी आरक्षण के नाम पर बांट दिया जाता है।
युवा एक-दूसरे से लड़ता रहता है।
राजनीति अपना काम करती रहती है।
और रोजगार का सवाल पीछे छूट जाता है।
क्या यह स्थिति हमारे लिए चिंता का विषय नहीं होनी चाहिए?
धर्म हमारा विश्वास है, राजनीति का हथियार नहीं
धर्म व्यक्ति की आस्था और विश्वास का विषय है।
लेकिन जब धर्म को राजनीतिक संघर्ष का हथियार बना दिया जाता है, तो उसका सबसे बड़ा नुकसान समाज को होता है।
मंदिर-मस्जिद के मुद्दे चुनाव जिता सकते हैं।
जातीय ध्रुवीकरण वोट दिला सकता है।
लेकिन—
मंदिर-मस्जिद से बेरोजगार युवा को नौकरी नहीं मिलती।
जातीय नारे से किसान की लागत कम नहीं होती।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अस्पताल का बिल कम नहीं होता।
और धार्मिक उन्माद से किसी गरीब परिवार की आर्थिक स्थिति नहीं सुधरती।
फिर हम इन मुद्दों पर इतना क्यों लड़ रहे हैं?
महंगाई और बेरोजगारी पर इतनी खामोशी क्यों?
जब रसोई का बजट बिगड़ता है, तो धर्म नहीं पूछता कि घर किसका है।
जब नौकरी नहीं मिलती, तो बेरोजगारी जाति नहीं पूछती।
जब कोई व्यक्ति अस्पताल में भर्ती होता है, तो बीमारी यह नहीं देखती कि वह किस राजनीतिक दल का समर्थक है।
गरीब और मध्यम वर्ग के सामने आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और महंगाई जैसे सवाल खड़े हैं।
एक गंभीर बीमारी पूरे परिवार की वर्षों की बचत खत्म कर सकती है।
एक अच्छी शिक्षा आज भी बहुत से परिवारों के लिए आर्थिक बोझ है।
क्या ऐसा भारत नहीं होना चाहिए जहां गरीब बच्चे को भी उच्च गुणवत्ता की शिक्षा और गरीब परिवार को भी सम्मानजनक स्वास्थ्य सुविधा मिले?
नेता लड़ते हैं, जनता क्यों लड़े?
यह सवाल हमें जरूर पूछना चाहिए।
राजनीतिक नेता एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं।
कल वही नेता किसी दूसरे राजनीतिक समीकरण में एक-दूसरे के साथ भी दिखाई दे सकते हैं।
सत्ता बदलती है।
गठबंधन बदलते हैं।
राजनीतिक समीकरण बदलते हैं।
लेकिन आम आदमी?
वह वहीं रहता है।
उसका पड़ोसी वहीं रहता है।
उसका गांव वहीं रहता है।
उसके बच्चे उसी समाज में बड़े होते हैं।
इसलिए नेताओं की राजनीतिक लड़ाई को अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी बना लेना सबसे बड़ी भूल है।
भारत के सामने पाकिस्तान ही एकमात्र चुनौती नहीं है
पाकिस्तान हमारे लिए सुरक्षा चुनौती रहा है और रहेगा।
लेकिन आज भारत को चीन की बढ़ती आर्थिक, तकनीकी और सैन्य शक्ति को भी गंभीरता से देखना होगा। भारत की सीमाओं के चारों ओर सबसे बड़े खतरे के रूप में उभर रहे चीन से मुकाबला केवल नारों से नहीं किया जा सकता। एक दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी। भारत के नागरिकों को मजबूत अर्थव्यवस्था चाहिए।विश्वस्तरीय शिक्षा चाहिए। उच्च स्तरीय निशुल्क चिकित्सा सुविधा चाहिए!तकनीकी क्षमता चाहिए।
आधुनिक उद्योग चाहिए।रोजगार चाहिए।
मजबूत सीमाएं चाहिए।और सबसे बढ़कर—
अंदर से मजबूत और एकजुट समाज चाहिए।
क्योंकि बाहरी दुश्मन से हमारी सेना लड़ सकती है।लेकिन समाज के भीतर पैदा हुई बढ़ रही नफरत से कौन लड़ेगा?
क्या हम सामाजिक विस्फोट की ओर बढ़ रहे हैं?मैं यह सवाल डर पैदा करने के लिए नहीं, चेताने के लिए पूछ रहा हूं।
जब धर्म के नाम पर समाज बंटे...
जब जाति के नाम पर समाज बंटे...
जब आरक्षण के नाम पर युवा एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हों...जब राजनीतिक मतभेद व्यक्तिगत दुश्मनी बन जाएं...
और उसी समय महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक असमानता जैसे वास्तविक मुद्दे पीछे चले जाएं—
तो हमें रुककर सोचना ही होगा।
कहीं हम विकास की बहस छोड़कर पहचान की लड़ाई में तो नहीं फंस गए हैं?
क्योंकि नफरत का बीज बोना बहुत आसान है।लेकिन उसके बाद समाज में पैदा हुई दरार को भरना बहुत कठिन होता है।
अभी भी समय हैहमें किसी एक राजनीतिक दल को खलनायक बनाकर समस्या का समाधान नहीं मिलेगा।सत्ता पक्ष से भी सवाल पूछने होंगे।विपक्ष से भी सवाल पूछने होंगे।
अपने नेताओं से भी सवाल पूछने होंगे।
और सबसे जरूरी—खुद से भी सवाल पूछना होगा।क्या हम अपने बच्चों को ऐसा भारत देना चाहते हैं जहां उनकी पहचान उनकी योग्यता से पहले तय हो?
जहां धर्म देखकर दोस्ती और दुश्मनी तय हो?
जहां जाति देखकर सम्मान मिले या अपमान?
जहां आरक्षण के नाम पर युवा आपस में लड़ते रहें, लेकिन सरकारों से पर्याप्त रोजगार और बेहतर शिक्षा का सवाल न पूछें?
या हम ऐसा भारत चाहते हैं जहां—
हर बच्चे को अच्छी शिक्षा मिले।
हर युवा को अवसर मिले।
गरीब को सम्मानजनक स्वास्थ्य सेवा मिले।
किसान को उसकी मेहनत का उचित मूल्य मिले।मजदूर को सम्मान मिले।
महिला सुरक्षित हो।व्यापारी बिना भय के अपना काम कर सके।और धर्म तथा जाति इंसानियत से बड़ी न हो।
मेरा भारत कैसा हो?
मैं ऐसा भारत चाहता हूं जहां हिंदू को मुसलमान से लड़ाने की जरूरत न पड़े।
जहां अगड़े को पिछड़े से लड़ाने की जरूरत न पड़े।
जहां आरक्षण समर्थक और आरक्षण विरोधी एक-दूसरे के दुश्मन न हों।
जहां राजनीतिक दल जनता को बांटने के बजाय जनता के बीच मौजूद समस्याओं को हल करने की प्रतियोगिता करें।
जहां चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा यह हो—
किसने कितने रोजगार दिए?
किसने शिक्षा कितनी बेहतर की?
किसने स्वास्थ्य सेवाएं कितनी सस्ती कीं?
किसने महंगाई पर कितना नियंत्रण किया?
किसने देश को आर्थिक और तकनीकी रूप से कितना मजबूत किया?
यही स्वस्थ लोकतंत्र है।
क्योंकि नेता बदलते रहेंगे… सत्ता बदलती रहेगी…
लेकिन यह देश हमारा है।
हमारे बच्चे इसी देश में रहेंगे।
हमारी आने वाली पीढ़ियां इसी समाज का निर्माण करेंगी।
इसलिए हमें तय करना होगा कि उन्हें विरासत में क्या देना है—
नफरत या भाईचारा?
धार्मिक उन्माद या वैज्ञानिक सोच?
जातीय संघर्ष या सामाजिक न्याय?
बेरोजगारी या अवसर?
डर या सम्मान?
मेरा विश्वास है कि भारत की ताकत उसकी विविधता में है।
हजारों वर्षों से अलग-अलग धर्म, जातियां, भाषाएं और संस्कृतियां इस देश में साथ रहती आई हैं।
इसलिए हमें एक-दूसरे को हराने का नहीं—
एक-दूसरे को साथ लेकर आगे बढ़ने का भारत बनाना होगा।
क्योंकि अंततः चुनाव कोई भी जीते—
देश तभी जीतेगा, जब उसका नागरिक जीतेगा।
और याद रखिए—
नफरत की जनहित की मुद्दा विहीन राजनीति से नेता राजनीतिक दल मजबूत हो सकते हैं,
लेकिन राष्ट्र मजबूत नहीं होता।

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